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2014
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जब नहीं था 
इन्सान 
धरती पर थे जंगल 
जंगली जानवर, परिंदे 
इन्हीं सबके बीच उतरा 
इन्सान 
और घटने लगे जंगल 
जंगली जानवर, परिंदे 
इन्सान 
बढ़ने लगा बेतहाशा 
अब कहाँ जाते जंगल,
जंगली जानवर, परिंदे 
प्रकृति किसी के साथ 
नहीं करती नाइन्साफ़ी 
सभी के लिए बनाती है जगह 
सो अब 
इन्सानों के भीतर उतरने लगे हैं 
जंगल, जंगली जानवर
और परिंदे 

प्रस्तुति - हूबनाथ 
साभार - नवनीत - हिन्दी डाइजेस्ट (जून 2014)   

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम संज्ञा था। उन्हीं की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थीं। वे उनसे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उनके घर आकर भोजन करें। लेकिन अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहते थे। कार्तिक शुक्ल का दिन आया। यमुना ने उस दिन यमराज को भोजन का निमंत्रण देकर उन्हें अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर दिया।

यमराज ने सोचा, मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता है। बहन जिस स्नेह और सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। यही सोचकर यमराज ने बहन के घर जाने का निर्णय कर लिया।

यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। यमुना ने उन्हें स्नान कराकर पूजा के बाद अनेक व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा, 'भाई आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई का आदर सत्कार करके टीका काढ़े, उसे तुम्हारा भय न रहे।'

यमराज ने 'तथास्तु' कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी।

ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता है। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।


भाई - बहन के प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल द्वितीय को मनाया जाता है। बहन से तिलक लगवाना व बहन के घर भोजन करना अति शुभ होता है। इस दिन बहन भाई की पूजा कर उसकी दीर्घायु तथा अपने सुहाग की कामना से हाथ जोड़ यमराज से प्रार्थना करती है। इस दिन सूर्य नारायण कन्या यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करवाया था। इस कारण इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। 

आप सभी पाठकों को दीपोत्सव पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। सादर  … अभिनन्दन।।


महादेवी वर्मा 
मधुर मधुर मेरे दीपक जल
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल 
प्रियतम का पथ आलोकित कर। 

सौरभ फैला विपुल धूप बन 
मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन 
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित 
तेरे जीवन का अणु गल गल। 
पुलक पुलक मेरे दीपक जल। 

सारे शीतल कोमल नूतन 
मांग रहे तुझको ज्वाला कण 
विश्वसलभ सिर धुनता कहता, 'मैं 
हाय न जल पाया तुझमें मिल !'
सिहर सिहर मेरे दीपक जल। 

जलते नभ में देख असंख्यक 
स्नेहहीन नित कितने दीपक 
जलमय सागर का उर जलता 
विद्युत से घिरता है बादल 
विहंस विहंस मेरे दीपक जल।  

द्रुम के अंग हरित कोमलतम 
ज्वाला को करते हृदयंगम 
वसुधा के जड़ अंतर में भी 
बंदी नहीं है तापों की हलचल !
बिखर बिखर मेरे दीपक जल !

मेरे निश्वासों से द्रुतवर 
सुभग न तू बुझने का भय कर 
मैं अंचल की ओट किए हूं 
अपनी मृदु पलकों से चंचल !
सहज सहज मेरे दीपक जल 

सीमा की लघुता का बंधन 
है अनादि तू मत घड़ियां गिन 
मैं दृग के अक्षय कोशों से 
तुझमें भरती हूं आंसू-जल !
सजल सजल मेरे दीपक जल 

तम असीम तेरा प्रकाश चिर 
खेलेंगे नव खेल निरंतर 
तम के अणु अणु में विद्युत सा 
अमिट चित्र अंकित करता चल !
सरल सरल मेरे दीपक जल ! 

तू जल जल होता जितना क्षय 
वह समीप आता छलनामय 
मधुर मिलन में मिट जाना तू-
उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल
मदिर मदिर मेरे दीपक जल 
प्रियतम का पथ आलोकित कर !

- महादेवी वर्मा

त्रिलोचन 
इस जीवन में रह न जाए मल 
द्वेष, दंभ, अन्याय, घृणा, छल 
चरण चरण चल गृह कर उज्जवल 
गृह गृह की लक्ष्मी मुसकाओ 

आज मुक्त कर मन के बंधन 
करो ज्योति का जय का वंदन 
स्नेह अतुल धन, धन्य यह भुवन 
बन कर स्नेह गीत लहराओ 

कर्मयोग कल तक के भूलो 
जीवन-सुमन सुरभि पर फूलो 
छवि छवि छू लो, सुख से झूलो 
जीवन की नव छवि बरसाओ 

ये अनंत के लघु लघु तारे 
दुर्बल अपनी ज्योति पसारे 
अंधकार से कभी न हारे 
प्रतिमन वही लगन सरसाओ। 


- त्रिलोचन   

फिर आ गई दिवाली की हंसती हुई यह शाम 
रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम। 

यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार 
उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार। 

यह जिंदगी के रुख पे मचलती हुई दुल्हन 
घूंघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन। 

शायर के इक तखय्युले-रंगी का है समां 
उतरी है कहकशां कहीं, होता है यह गुमां।  


- मैथिलीशरण गुप्त


मैथिलीशरण गुप्त 

यह दीप अकेला स्नेहभरा 
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। 

यह जन है: गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा ?
पनडुब्बा: ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लाएगा ?
यह समिधा: ऐसी आग हठीला विरल सुलगाएगा। 
यह अद्वितीय: यह मेरा: यह मैं स्वयं विसर्जित: 

यह दीप अकेला, स्नेहभरा 
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 

यह मधु: स्वयं काल की मौना का दु:ख संचय 
यह गोरस: जीवन कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकना निर्भय 
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुत: इसको भी शक्ति दे दो।  

यह दीप अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 

यह वह विश्वास नहीं, जो अपनी लघुता में भी कांपा,
यह पीड़ा जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुलाते कडुवे तम में
यह सदा द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त नेत्र। 
उल्लंब बाहु, यह चिर अखंड अपनापा। 
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भी भक्ति को दे दो।  

यह दीप अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 


- सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'

हाथों में फुलझड़ी 
बहुत-से पटाके,
धम-धम, धूम-धूम 
धमा-धम धमाके 

दूर तक अनार उठा 
चरखी भी भागी,
बुझी-जली, जली-बुझी 
सोते से जागी 

रामू, बिरजू दौड़े 
नीलू भी आई,
'मुन्नी कहां, मुन्नी कहां'
बोलो तो भाई!

बंद किए कान खड़ी 
कोने में भाई,
सबने मिल फुलझड़ी 
उसको पकड़ाई 

नन्ही-सी मुन्नी 
और नन्ही-सी फुलझड़ी,
इधर-उधर देखती 
वह भी आगे बढ़ी 

- प्रयाग शुक्ल


प्रयाग शुक्ल 

भरी दुपहरी में अधियारा 
सूरज परछाई से हारा 
अंतरतम का नेह निचोड़ें -
बुझी हुई बाती सुलगाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 


हम पड़ाव को समझे मंजिल 
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल 
वर्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा 
अपनों के विघ्नों ने घेरा 
अंतिम जय का वज्र बनाने -
नव दधीची हड्डियां गलाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 


- अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी 
( भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, सन् 1924 ई. को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। अटल जी सफल राजनीतिज्ञ के साथ साथ एक कवि भी हैं। "मेरी इक्यावन कविताएँ" उनका प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है।)

दीपावली के इस शुभ अवसर पर "हिन्दी चिट्ठा" आपके समक्ष
17 से 23 अक्टूबर, 2014 तक 
हिन्दी कवियों की दीपावली पर केन्द्रित बेहतरीन रचनाएँ प्रस्तुत करेगा। आशा है कि आप सबको ये प्रस्तुति पसन्द आएगी। शुभ दीपावली।। सादर ... अभिनन्दन।।

डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन' 

 है अँधेरी रात पर ,
दीवा जलाना कब मना है ?
क्या हवाएँ थीं की उजड़ा 
प्यार का वह आशियाना 
कुछ न आया काम तेरा 
शोर करना , गुल मचाना ,
नाश की उन शक्तियों के 
साथ चलता ज़ोर किसका ,
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि ,
तुझे होगा बताना जो बसे हैं 
वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से ,
पर किसी उजड़े हुए को 
फ़िर बसाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर 
दीवा जलाना कब मना है ?

                                   - डॉ . हरिवंश राय 'बच्चन'

सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे 
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहने वाली।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,  
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।


रामधारी सिंह 'दिनकर'

रामधारी सिंह 'दिनकर'
(राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई. में बिहार राज्य के मुँगेर जिले के सिमरिया नामक गाँव में हुआ था। "रेणुका", "हुंकार", "रसवन्ती", "सामधेनी", "कुरुक्षेत्र", "रश्मिरथी", "उर्वशी", "परशुराम की प्रतिज्ञा" आदि इनके काव्य संग्रह है। "अर्द्धनारीश्वर", "वट-पीपल", "उजली आग", "संस्कृति के चार अध्याय" (निबन्ध) , "मिट्टी की ओर", "काव्य की भूमिका", "देश-विदेश" (यात्रा) आदि इनकी गद्य रचनाएँ है। सन् 1959 ई. में भारत सरकार ने इन्हें "पद्मभूषण" की उपाधि से सम्मानित किया तथा सन् 1962 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। दिनकर जी को इनके सुप्रसिद्ध काव्य संग्रह "उर्वशी" के लिए सन् 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दिनकर जी की असामयिक मृत्यु  24अप्रैल, सन् 1974 ई. में हुई थी।)   

चींटी को देखा ?
वह सरल, विरल, काली रेखा 
तम के तागे-सी जो हिल-डुल 
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल 
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाति 
काम करती वह सतत !
कन-कन कनके चुनती अविरत !


गाय चराती,
धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना सँवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती ।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक ।


देखा चींटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालों की-सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय 
विचरण करती, श्रम में तन्मय, 
वह जीवन की चिनगी अक्षय ।

वह भी क्या देही है तिल-सी ?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी ।
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती ।।



 सुमित्रानन्दन पन्त
(साभार - "युगवाणी" से)

सुमित्रानन्दन पन्त

कवि त्रिलोचन शास्त्री 
बढ़ अकेला 
यदि कोई संग तेरे पंथ वेला
बढ़ अकेला
चरण ये तेरे रुके ही यदि रहेंगे 
देखने वाले तुझे, कह, क्या कहेंगे 
हो न कुंठित, हो न स्तंभित 
यह मधुर अभियान वेला
बढ़ अकेला 
श्वास ये संगी तरंगी क्षण प्रति क्षण 
और प्रति पदचिन्ह परिचित पंथ के कण 
शून्य का श्रृंगार तू 
उपहार तू किस काम वेला 
बढ़ अकेला
विश्व जीवन मूक दिन का प्राणायाम स्वर 
सान्द्र पर्वत - श्रृंग पर अभिराम निर्झर 
सकल जीवन जो जगत के 
खेल भर उल्लास खेला 
बढ़ अकेला 

कवि त्रिलोचन शास्त्री

( "बढ़ अकेला" शीर्षक में कवि ने व्यक्ति को निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ने की प्रेरणा दी है।)

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी उँगलियों से बुलाता है। 
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है 
आँखों में हरी परछाँइयाँ फिसलती हैं 
कन्धों पर एक हरा आकाश ठहरा है 
होंठ मेरे एक गहरे हरे गान में काँपते हैं -

मैं नहीं हूँ और कुछ 
बस एक हरा पेड़ हूँ  
हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना !

ओ जंगल युवा,
बुलाते हो 
आता हूँ 
एक हरे वसन्त में डूबा हुआ 
आSताS हूँ...।  


- अशोक वाजपेयी


अशोक वाजपेयी 

फूल झरता है 
फूल शब्द नहीं!
बच्चा गेंद उछालता है,
सदियों के पार 
लोकती है उसे एक बच्ची!
बूढ़ा गाता है एक पद्य,
दुहराता है दूसरा बूढ़ा,
भूगोल और इतिहास से परे 
किसी दालान में बैठा हुआ!
न बच्चा रहेगा, 
न बूढ़ा,
न गेंद, न फूल, न दालान 
रहेंगे फिर भी शब्द 
भाषा एकमात्र अनन्त है!

अशोक वाजपेयी
( काव्य - संग्रह तिनका - तिनका से साभार )


अशोक वाजपेयी 

बायें से दायें : नील आर्मस्ट्रांग, माइकल कालिन्स, एडविन एल्ड्रिन 
दुनिया के सभी भागों में स्त्री - पुरुष और बच्चे रेडियो से कान सटाए बैठे थे , जिनके पास टेलीविज़न थे, वे उसके पर्दे पर आँखें गड़ाए थे। मानवता के सम्पूर्ण इतिहास की सर्वाधिक रोमांचक घटना के एक - एक क्षण के वे भागीदार बन रहे थे--- उत्सुकता और कुतूहल के कारण अपने अस्तित्व से ही बिल्कुल बेखबर हो गए थे। युग - युग से किस देश और जाति ने चन्द्रमा तक पहुँचने के सपने नहीं सँजोए--- आज इस धरा के ही दो मानव उन सपनों को सच कर दिखाने के लिए कृत-संकल्प थे।

सोमवार २१ जुलाई , १९६९ को बहुत सवेरे ईगल नामक चन्द्रयान नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन को लेकर चन्द्रतल पर उतर गया। चन्द्रयान धूल उड़ाता हुआ चन्द्रमा के जलविहीन 'शान्ति सागर' में उतरा। भारतीय समय के अनुसार एक बजकर सैंतालिस मिनट पर किसी अन्य ग्रह पर मानव पहली बार पहुँचा। असीम अन्तरिक्ष को चीरते हुए पृथ्वी से चार लाख किलोमीटर दूर चन्द्रमा पर पहुँचने में मानव को १०२ घंटे ४५ मिनट और 42 सेकेण्ड समय लगा।

अपोलो - ११ को कप केनेडी से बुधवार, १६ जुलाई , १९६९ को छोड़ा गया था। इसमें तीन यात्री थे--- कमांडर नील आर्मस्ट्रांग , माइकल कालिन्स और एडविन एल्ड्रिन। चन्द्रमा की कक्षा में चन्द्रयान मूल यान कोलम्बिया से अलग हो गया और फिर चन्द्रतल पर उतर गया। उस समय माइकल कालिन्स मूल यान में ९६ किलोमीटर की ऊँचाई पर निरन्तर चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहे थे।

नील आर्मस्ट्रांग ने चन्द्रतल से पृथ्वी वर्णन करते हुए कहा कि यह बहुत बड़ी, चमकीली और सुन्दर (बिग, ब्राइट एन्ड ब्यूटीफुल) दिखाई दे रही है। एल्ड्रिन ने भावविभोर होकर कहा--- सुन्दर दृश्य है , सबकुछ सुन्दर है। उसने कहा कि जहाँ हम उतरे हैं, उससे कुछ ही दूरी पर हमने बैंगनी रंग की चट्टान देखी है। चन्द्रमा की मिट्टी और चट्टानें सूर्य की रोशनी में चमक रही हैं। यही एक भव्य एकान्त स्थान है।

चन्द्रयान ठीक स्थिति में है, यह निरीक्षण करके, कुछ खा-पीकर और सुस्ता लेने के बाद नील आर्मस्ट्रांग चन्द्रयान से बाहर निकले। चन्द्रयान की सीढ़ियों से धीरे - धीरे वह नीचे उतरे। उन्होंने अपना बायाँ पाँव चन्द्रतल पर रखा, जबकि दायाँ पाँव चन्द्रयान पर ही रखा। इस बीच आर्मस्ट्रांग दोनों हाथ से चन्द्रयान को अच्छी तरह पकड़े रहे। उन्हें यह तय कर लेना था कि वैज्ञानिक चन्द्रतल को जैसा समझते रहे हैं, वह उससे एकदम भिन्न तो नहीं है। आश्वस्त होने के बाद वह यान के आस-पास ही कुछ कदम चले। चन्द्रतल पर पाँव रखते हुए उन्होंने कहा, यद्यपि यह मानव  छोटा-सा कदम है, लेकिन मानवता के लिए यह बहुत ऊँची छलाँग है। 

अभी तक एल्ड्रिन भले ही भीतर बैठा हो, लेकिन वह निष्क्रिय नहीं था। उसने मूवी कैमरे से आर्मस्ट्रांग के चित्र लेने शुरू कर दिए थे। बीस मिनट बाद ही एडविन एल्ड्रिन भी चन्द्रयान से बाहर निकले। उन्होंने भी चन्द्रतल पर चलकर देखा। तब तक आर्मस्ट्रांग चन्द्रधूल का एक तात्कालिक नमूना जेब में रख चुके थे। अब उन्होंने टेलीविज़न कैमरे को त्रिपाद पर जमा दिया।

अरबों डॉलर खर्च करके मानव चन्द्रतल पर पहुँचा था, उसे अपने सीमित समय में एक - एक क्षण का उपयोग करना था। दोनों चन्द्र - विजेताओं को चन्द्रमा की चट्टानों तथा मिट्टी के नमूने लेने थे। कई तरह के उपकरण भी वहाँ स्थापित करने थे, जो बाद में भी पृथ्वी पर वैज्ञानिक जानकारी भेजते रह सकें।

इन चन्द्र - विजेताओं ने चन्द्रतल पर भूकम्पमापी यंत्र स्थापित किया और लेसर परावर्त्तक रखा। इन्होंने एक धातु - फलक, जिस पर तीनों यात्रियों और अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के हस्ताक्षर थे, वहाँ रखा। धातु - फलक पर खुदे शब्दों को आर्मस्ट्रांग ने जोर से पढ़ा --- " जुलाई १९६९ में पृथ्वी ग्रह के मानव चन्द्रमा के इस स्थान पर उतरे। हम यहाँ सारी मानव जाति के लिए शान्ति की कामना लेकर आए। "

दोनों चन्द्र-यात्रियों ने अमेरिकी ध्वज चन्द्रतल पर फहरा दिया। वायु न होने के कारण इस ध्वज को इस तरह बनाया गया था कि स्प्रिंग की सहायता से यह फैला हुआ ही रहे। विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों के सन्देशों की माइक्रो फिल्म भी उन्होंने चन्द्रतल पर छोड़ दी। दो रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों ( यूरी गागरिन और एम. के. मोरोव ) को मरणोपरान्त दिए पदक और तीन अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्रियों ( ग्रिसम, व्हाइट और शैफी ) को दिए गए पदकों की अनुकृतियाँ वहाँ रखीं।

अपने व्यस्त कार्यक्रम को पूरा करने में चन्द्र - यात्रियों को थकान हो जानी स्वाभाविक थी, लेकिन फिर भी वे बड़े प्रसन्न थे। आरम्भ में वे बड़ी सावधानी के साथ एक - एक कदम रख रहे थे, लेकिन बाद में वे कंगारूओं की तरह उछल - उछलकर चलते देखे गए।

मानव को चन्द्रमा पर उतारने का यह सर्वप्रथम प्रयास होते हुए भी असाधारण रूप से सफल रहा यद्यपि हर क्षण, हर पग पर खतरे थे। चन्द्रतल पर मानव के पाँव के निशान, उसके द्वारा वैज्ञानिक तथा तकनिकी क्षेत्र में की गई असाधारण प्रगति के प्रतीक हैं। जिस क्षण डगमग - डगमग करते मानव के पग उस धूल - धूसरित अनछुई सतह पर पड़े तो मानो वह हज़ारों - लाखों साल से पालित - पोषित सैकड़ों अन्धविश्वासों तथा कपोल - कल्पनाओं पर पद - प्रहार ही हुआ। कवियों की कल्पना के सलोने चाँद को वैज्ञानिक ने बदसूरत और जीवनहीन करार दे दिया---भला अब चन्द्रमुखी कहलाना किसे रुचिकर लगेगा। 

हमारे देश में ही नहीं, संसार की प्रत्येक जाति ने अपनी भाषा में चन्द्रमा के बारे में कहानियाँ गढ़ी हैं और कवियों ने कविताएँ रची हैं। किसी ने उसे रजनीपति माना तो किसी ने उसे रात्रि की देवी कहकर पुकारा। किसी विरहिणी ने उसे अपना दूत बनाया तो किसी ने उसके पीलेपन से क्षुब्ध होकर उसे बूढ़ा और बीमार ही समझ लिया। बालक श्रीराम चन्द्रमा को खिलौना समझकर उसके लिए मचलते हैं तो सूर के श्रीकृष्ण भी उसके लिए हठ करते हैं। बालक को शान्त करने के लिए एक ही उपाय था---चन्द्रमा की छवि को पानी में दिखा देना। लेकिन मानव की प्रगति का चक्र कितना घूम गया है। इस लम्बी विकास - यात्रा को श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक ही वाक्य में बाँध दिया है --- " पहले पानी में चंदा को उतारा जाता था और आज चाँद पर मानव पहुँच गया है। "

मानव मन सदा से ही अज्ञात के रहस्यों को खोलने और जानने - समझने को उत्सुक रहा है। जहाँ तक वह नहीं पहुँच सकता था वहाँ वह कल्पना के पंखों पर उड़कर पहुँचा। उसकी अनगढ़ और अविश्वसनीय कथाएँ उसे सत्य के निकट पहुँचाने में प्रेरणा - शक्ति का काम करती रहीं।

अन्तरिक्ष युग का सूत्रपात ४ अक्टूबर, 1956 को हुआ था जब सोवियत संघ ने अपना पहला स्पुतनिक छोड़ा। प्रथम अन्तरिक्ष यात्री बनने का गौरव यूरी गागरिन को प्राप्त हुआ। अन्तरिक्ष युग के आरम्भ के ठीक ११ वर्ष ९ मास १७ दिन बाद चन्द्रतल पर मानव उतर गया।

दिसम्बर १९६८ में पहली बार अपोलो - ८ के तीनों अन्तरिक्ष - यात्री चन्द्रमा के पड़ोस तक पहुँचे थे। बीच की अवधि में रूस और अमेरिका दोनों ही देशों ने अनेक अन्तरिक्ष यान छोड़े। इनमें कुछ स - मानव यान थे और कुछ मानव - रहित। इसे मानव का साहस कहें या दुस्साहस कि उसने अन्तरिक्ष में पहुँचकर यान से बाहर निकल अनन्त अन्तरिक्ष में विचरण भी शुरू कर दिया। अन्तरिक्ष में परिक्रमा करते दो यानों को जोड़ने और एक यान से दूसरे यान में यात्रियों के चले जाने के चमत्कारी करतब भी किए गए। अपोलो - ११ द्वारा चन्द्रविजय से पूर्व मानो अपोलो - १० के द्वारा नाटक का पूर्वाभिनय ही किया गया था। इसके तीन यात्री अन्तरिक्ष यान को चन्द्रमा की कक्षा में ले गए थे। एक यात्री मूल यान को कक्षा में घुमाता रहा था और अन्य दो यात्री चन्द्रयान में बैठकर उसे चन्द्रमा से केवल ९ मील की दूरी तक ले गए थे। इन्होंने चन्द्र - विजेताओं के उतरने के सम्भावित स्थल का अध्ययन किया और अनेक चित्र खींचे थे। चन्द्रयान को मूल यान से जोड़ा और फिर सकुशल पृथ्वी पर लौट आए।

मानव को चन्द्रतल तक ले जाने और लौटा लानेवाले यान के बारे में भला कौन नहीं जानना चाहेगा। अपोलो - यान - सैटर्न - ५ राकेट से प्रक्षेपित किया जाता है। वह विश्व का सबसे शक्तिशाली वाहन है। अन्तरिक्ष यान के तीन भाग होते हैं या इन्हें तीन माड्यूल कह सकते हैं।

कमांड माड्यूल का निर्माण इस दृष्टि से किया जाता है कि वापसी के समय पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करते समय तीव्र ताप और दबावों को सहन कर सके। नियन्त्रण कक्ष, शयनागार, भोजनकक्ष और प्रयोगशाला---इन सब का मिला - जुला रूप ही यह माड्यूल होता है। प्रक्षेपण के समय यदि कोई दुर्घटना हो जाये, तो यात्री अपने बचाव के लिए इसे शेष यान से पृथक् कर सकते हैं। पुन: प्रवेश के लिए बने कमांड कैप्सूल का वजन ५५०० किलोग्राम था। इसमें लगभग साढ़े पाँच घन मीटर खाली स्थान था, जहाँ कि तीनों यात्री अपने सामान्य कार्य सम्पन्न कर सकें। इस स्थान को हम औसत दर्जे की कार जितना मान सकते हैं। कैप्सूल जब तैयार होता है, उस समय इसमें पाँच विद्युत् बैटरियाँ होती हैं और १२ राकेट इंजन जुड़े होते हैं। तीन आदमियों के लिए चौदह दिन की खाद्य सामग्री और पानी के भण्डार एवं मल के निष्कासन की व्यवस्था रहती है। इसमें पैराशूट भी रहते हैं। यात्रियों को बिना चोट पहुँचाए, यह कड़ी - से - कड़ी जमीन पर उतर सकता है।

अन्तरिक्ष यान का दूसरा भाग होता है सर्विस माड्यूल--- यह औसत आकर के ट्रक जितना होता है। इसमें दस लाख किलोमीटर की यात्रा करने के लिए पर्याप्त ईंधन था और १४ दिन तक तीन यात्रियों के साँस लेने लायक प्राण - वायु की व्यवस्था थी। यान को चन्द्र कक्षा में स्थापित करने के लिए उसकी गति कम करनी पड़ती है और सर्विस माड्यूल के शक्तिशाली राकेट मोटर दाग कर ही ऐसा किया जाता है।

चन्द्रयान यानी अपोलो - ११ का ईगल अन्तरिक्ष यान का एक भाग होते हुए भी अपने में पूर्ण था। इसमें दो खंड थे--- अवरोह भाग और आरोह भाग। अवरोह भाग में ८२०० किलो प्राणोदक था, जिससे ४५०० किलो प्रघात के इंजन को चलाया जा सके। चालकों के साँस लेने के लिए ऑक्सीजन गैस, पीने का पानी और चन्द्रतल पर यान को ठंडा रखने की व्यवस्था की गई थी। चन्द्रयान की सभी टाँगें समतल पर टिकनी आवश्यक नहीं, यह आड़ा - तिरछा भी खड़ा हो सकता है। अवरोही भाग में चार रेडियो रिसीवर, ट्रान्समीटर, बैटरियाँ, मूलयान से और पृथ्वी से संचार - व्यवस्था कायम रखने के लिए सात एरियर लगे थे। ईगल के दोनों भाग किसी भी समय अलग किए जा सकते थे। चन्द्रतल से वापसी के समय चन्द्रयान का नीचे का भाग प्रक्षेपण यन्त्र का काम देता है और उसे चन्द्रतल पर ही छोड़ दिया गया।

नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन ने चन्द्रतल पर २१ घंटे ३६ मिनट बिताए। चन्द्रतल पर इन दो यात्रियों ने पाँवों के ऐसे निशान छोड़े कि जैसे किसी हल चलाए खेत में पड़ जाते हैं। उन्होंने लाखों डालर का सामान भी वहीं छोड़ दिया।

दोनों चन्द्र - विजेताओं ने ऊपरी भाग में उड़ान भरकर चन्द्रकक्ष में परिक्रमा करते हुए मूलयान से अपने यान को जोड़ा। फिर वे दोनों यात्री अपने साथी माइकल कालिन्स से आ मिले। अब चन्द्रयान को अलग कर दिया गया और उसे कक्ष में ही छोड़ दिया गया। इंजन दाग कर यात्री वापसी के लिए पृथ्वी के मार्ग पर बढ़ चले। ये यात्री प्रशान्त महासागर में उतरे।

इन यात्रियों को सीधे चन्द्र प्रयोगशाला में ले जाया गया। कई सप्ताह किसी से मिलने - जुलने नहीं दिया गया। उनके अनुभव रिकार्ड किए गए। वैज्ञानिकों को यह भी जाँच करनी थी कि ये यात्री ऐसे कीटाणु तो अपने साथ नहीं ले आए, जो मानव जाति के लिए घातक हों। इन यात्रियों द्वारा लाई गई धूल और चन्द्र - चट्टानों के नमूनों को अनुसंधान और प्रयोग करने के लिए विभिन्न देशों के विशेषज्ञों को सौंप दिया गया।

अपोलो - ११ की सफलता के पश्चात् अमेरिका ने अपोलो - १२ में भी तीन यात्रियों को चन्द्रतल पर खोज करने के लिए भेजा। इसके बाद अपोलो - १३ की यात्रा दुर्घटनावश बीच में ही स्थगित करनी पड़ी।

अभी चन्द्रमा के लिए अनेक उड़ानें होंगी। दूसरे ग्रहों के लिए मानव - रहित यान छोड़े जा रहे हैं। अन्तरिक्ष में परिक्रमा करनेवाला स्टेशन स्थापित करने की दिशा में तेजी से प्रयत्न किए जा रहे हैं। ऐसा स्टेशन बन जाने पर ब्रह्माण्ड के रहस्यों की पर्तें खोजने में काफी सहायता मिलेगी।

यह पृथ्वी मानव के लिए पालने के समान है। वह हमेशा - हमेशा के लिए इसकी परिधि में बँधा हुआ नहीं रह सकता। अज्ञात की खोज में वह कहाँ तक पहुँचेगा, कौन कह सकता है ?


--- जयप्रकाश भारती



जगजीवन में चिर महान 
सौन्दर्यपूर्ण औ सत्य-प्राण 

मैं उसका प्रेमी बनूँ नाथ 
जो हो मानव के हित समान 

जिससे जीवन में मिले शक्ति,
छूटे भय, संशय, अन्धभक्ति,

मैं वह प्रकाश बन सकूँ नाथ 
मिल जायें जिसमें अखिल व्यक्ति,

पाकर प्रभु तुमसे अमर दान
करने मानव का परित्राण 


ला सकूँ विश्व में एक बार 
फिर से नवजीवन का विहान।  

कवि सुमित्रानन्दन पन्त 

कवि सुमित्रानन्दन पन्त 
( प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म सन् 1900 ई. में अल्मोड़ा के निकट कौसानी ग्राम में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम की ही पाठशाला में हुई। असहयोग आन्दोलन के समय इन्होंने कॉलेज छोड़। दिया इनकी साहित्यिक सेवा के लिए भारत सरकार ने इन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान "पद्म भूषण" से विभूषित किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, चिदम्बरा आदि। पन्त निधन 28 दिसम्बर, सन् 1977 ई. को हुआ। ) 

वह आता 
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। 
पेट - पीठ दोनों मिलकर हैं एक 
चल रहा लकुटिया टेक 
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को 
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलता 
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। 
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये 
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते 
और दाहिना दया - दृष्टि पाने की ओर बढ़ाये। 
भूख से सूख ओठ जब जाते 
दाता - भाग्यविधाता से क्या पाते। 
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते। 



कविवर सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला '

सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला '
( सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' का हिन्दी साहित्य में एक महत्वपूर्ण तथा विशेष स्थान है। निराला जी ने हिन्दी की गद्य तथा पद्य दोनों विधाओं में अनेक रचनाएँ लिखीं। निराला जी की काव्यकला का उत्कृष्ट स्वरूप " परिमल " काव्य - संग्रह में मिलता है। प्रस्तुत कविता ' भिक्षुक ' उसी से ली गयी है। समाज के पीड़ितों, दुःखी, दीन - दलितों के प्रति उनका हृदय विशेष संवेदनशील था। उसकी झलक इस कविता में स्पष्टत: दिखायी पड़ती है। ) 

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