हिन्दी साहित्य की रचनाओं का हिन्दी वेब ब्लॉग

September 2014
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस अटल बिहारी वाजपेयी अमर उजाला अशोक वाजपेयी इतिहास इसरो एक साल ओसामा मंजर कविता कहानी कैलाश वाजपेयी क्षुद्रग्रह गोपालदास 'नीरज' जन्म दिवस जयप्रकाश भारती जयशंकर प्रसाद जल संकट जानकारी ज्ञानेन्द्र रावत टिप्पणी डॉ . हरिवंश राय 'बच्चन' डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी तरुण विजय तीज-त्यौहार त्रिलोचन दीपावली नमस्कार नरेंद्र मोदी नववर्ष निबन्ध नेताजी सुभाष चंद्र बोस नेताजी सुभाषचंद्र बोस पत्र प्रधानमंत्री प्रभा मजूमदार प्रयाग शुक्ल प्रेरक प्रसंग प्रेरक-प्रसंग प्रेरणादायक लेख बॉक्सिंग डे भगत सिंह भगवान बुद्ध भाई दूज भारत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मंगलयान मनोज बाजपेयी महादेवी वर्मा मार्स ऑर्बिटर मिशन मास्टर रामकुमार मुकेश पाण्डेय 'चन्दन' मैथिलीशरण गुप्त यश राजीव कटारा राजीव सक्सेना रामधारी सिंह 'दिनकर' राममोहन पाठक रिपोर्ताज लेख लोहड़ी विदेशी अखबार से विनोबा भावे विशेष विश्व हिंदी सम्मेलन विश्व हिन्दी दिवस विश्व हिन्दी दिवस सप्ताह सम्मेलन-2016 वैज्ञानिक लेख व्यंग्य शुभारंभ संकल्प संपादकीय संस्मरण सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' समाज साभार सामान्य ज्ञान सियारामशरण गुप्त सुमित्रानन्दन पन्त सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' स्वागत हर्ष हिन्दी हिन्दी चिट्ठा हिन्दी दिवस हिन्दुस्तान दैनिक हिन्दुस्तान संपादकीय हूबनाथ हेमेन्द्र मिश्र

सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता? हां, मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे 
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहने वाली।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,  
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।


रामधारी सिंह 'दिनकर'

रामधारी सिंह 'दिनकर'
(राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई. में बिहार राज्य के मुँगेर जिले के सिमरिया नामक गाँव में हुआ था। "रेणुका", "हुंकार", "रसवन्ती", "सामधेनी", "कुरुक्षेत्र", "रश्मिरथी", "उर्वशी", "परशुराम की प्रतिज्ञा" आदि इनके काव्य संग्रह है। "अर्द्धनारीश्वर", "वट-पीपल", "उजली आग", "संस्कृति के चार अध्याय" (निबन्ध) , "मिट्टी की ओर", "काव्य की भूमिका", "देश-विदेश" (यात्रा) आदि इनकी गद्य रचनाएँ है। सन् 1959 ई. में भारत सरकार ने इन्हें "पद्मभूषण" की उपाधि से सम्मानित किया तथा सन् 1962 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें डी. लिट्. की मानद उपाधि से सम्मानित किया। दिनकर जी को इनके सुप्रसिद्ध काव्य संग्रह "उर्वशी" के लिए सन् 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दिनकर जी की असामयिक मृत्यु  24अप्रैल, सन् 1974 ई. में हुई थी।)   

चींटी को देखा ?
वह सरल, विरल, काली रेखा 
तम के तागे-सी जो हिल-डुल 
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल 
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाति 
काम करती वह सतत !
कन-कन कनके चुनती अविरत !


गाय चराती,
धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना सँवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती ।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक ।


देखा चींटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालों की-सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय 
विचरण करती, श्रम में तन्मय, 
वह जीवन की चिनगी अक्षय ।

वह भी क्या देही है तिल-सी ?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी ।
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती ।।



 सुमित्रानन्दन पन्त
(साभार - "युगवाणी" से)

सुमित्रानन्दन पन्त

कवि त्रिलोचन शास्त्री 
बढ़ अकेला 
यदि कोई संग तेरे पंथ वेला
बढ़ अकेला
चरण ये तेरे रुके ही यदि रहेंगे 
देखने वाले तुझे, कह, क्या कहेंगे 
हो न कुंठित, हो न स्तंभित 
यह मधुर अभियान वेला
बढ़ अकेला 
श्वास ये संगी तरंगी क्षण प्रति क्षण 
और प्रति पदचिन्ह परिचित पंथ के कण 
शून्य का श्रृंगार तू 
उपहार तू किस काम वेला 
बढ़ अकेला
विश्व जीवन मूक दिन का प्राणायाम स्वर 
सान्द्र पर्वत - श्रृंग पर अभिराम निर्झर 
सकल जीवन जो जगत के 
खेल भर उल्लास खेला 
बढ़ अकेला 

कवि त्रिलोचन शास्त्री

( "बढ़ अकेला" शीर्षक में कवि ने व्यक्ति को निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ने की प्रेरणा दी है।)

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी उँगलियों से बुलाता है। 
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है 
आँखों में हरी परछाँइयाँ फिसलती हैं 
कन्धों पर एक हरा आकाश ठहरा है 
होंठ मेरे एक गहरे हरे गान में काँपते हैं -

मैं नहीं हूँ और कुछ 
बस एक हरा पेड़ हूँ  
हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना !

ओ जंगल युवा,
बुलाते हो 
आता हूँ 
एक हरे वसन्त में डूबा हुआ 
आSताS हूँ...।  


- अशोक वाजपेयी


अशोक वाजपेयी 

बनारसी साड़ियाँ खरीदें केवल - Laethnic.com/sarees

योगदानकर्ता

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget