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चींटी - सुमित्रानन्दन पन्त

चींटी को देखा ? वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे-सी जो हिल-डुल चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल वह है पिपीलिका पाँति ! देखो ना, किस भाति काम करती वह सतत ! कन-कन कनके चुनती अविरत !

चींटी को देखा ?
वह सरल, विरल, काली रेखा 
तम के तागे-सी जो हिल-डुल 
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल 
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाति 
काम करती वह सतत !
कन-कन कनके चुनती अविरत !


गाय चराती,
धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना सँवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती ।

चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक ।


देखा चींटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालों की-सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय 
विचरण करती, श्रम में तन्मय, 
वह जीवन की चिनगी अक्षय ।

वह भी क्या देही है तिल-सी ?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी ।
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती ।।



 सुमित्रानन्दन पन्त
(साभार - "युगवाणी" से)

सुमित्रानन्दन पन्त

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स्कूल के दिनों में इतनी समझ नहीं थी तब तो खूब रट्टा मार लेते थे समझ में अब आती है इस सुन्दर कविता का अर्थ ..मर्म ...
प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

यह कविता हाईस्‍कूल में पढ़ी थी। आपकी पोस्‍ट ने फिर याद दिला दी। इसे साझा करने के लिए धन्‍यवाद। कबीर का कहना था कि चींटी से लेकर हाथी तक हर प्राणी को भगवान ने बनाया है। इसलिए हर प्राणी का सम्‍मान करना चाहिये। वैसें चींटी में सामाजिकता एवं सामूहिक सहयोग की जो भावना देखने को मिलती है, उससे धरती का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी मनुष्‍य भी सबक ले सकता है।

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