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युवा जंगल - अशोक वाजपेयी

एक युवा जंगल मुझे, अपनी हरी उँगलियों से बुलाता है। मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है आँखों में हरी परछाँइयाँ फिसलती हैं कन्धों पर एक हरा आकाश ठहरा है होंठ मेरे एक गहरे हरे गान में काँपते हैं -

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी उँगलियों से बुलाता है। 
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है 
आँखों में हरी परछाँइयाँ फिसलती हैं 
कन्धों पर एक हरा आकाश ठहरा है 
होंठ मेरे एक गहरे हरे गान में काँपते हैं -

मैं नहीं हूँ और कुछ 
बस एक हरा पेड़ हूँ  
हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना !

ओ जंगल युवा,
बुलाते हो 
आता हूँ 
एक हरे वसन्त में डूबा हुआ 
आSताS हूँ...।  


- अशोक वाजपेयी


अशोक वाजपेयी 

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सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 15/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर

हरियाली में डुबकियाँ लगा रहे हो मियाँ ...जरा सम्भल के :) :) :)

गजब की कविता ..आनन्द आ गया

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