हिन्दी साहित्य की रचनाओं का हिन्दी वेब ब्लॉग

October 2014
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस अटल बिहारी वाजपेयी अमर उजाला अशोक वाजपेयी इतिहास इसरो एक साल ओसामा मंजर कविता कहानी कैलाश वाजपेयी क्षुद्रग्रह गोपालदास 'नीरज' जन्म दिवस जयप्रकाश भारती जयशंकर प्रसाद जल संकट जानकारी ज्ञानेन्द्र रावत टिप्पणी डॉ . हरिवंश राय 'बच्चन' डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी तरुण विजय तीज-त्यौहार त्रिलोचन दीपावली नमस्कार नरेंद्र मोदी नववर्ष निबन्ध नेताजी सुभाष चंद्र बोस नेताजी सुभाषचंद्र बोस पत्र प्रधानमंत्री प्रभा मजूमदार प्रयाग शुक्ल प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार प्रेरक-प्रसंग प्रेरणादायक लेख बॉक्सिंग डे भगत सिंह भगवान बुद्ध भाई दूज भारत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मंगलयान मनोज बाजपेयी महादेवी वर्मा मार्स ऑर्बिटर मिशन मास्टर रामकुमार मुकेश पाण्डेय 'चन्दन' मैथिलीशरण गुप्त यश राजीव कटारा राजीव सक्सेना रामधारी सिंह 'दिनकर' राममोहन पाठक रिपोर्ताज लेख लोहड़ी विदेशी अखबार से विनोबा भावे विशेष विश्व हिंदी सम्मेलन विश्व हिन्दी दिवस विश्व हिन्दी दिवस सप्ताह सम्मेलन-2016 वैज्ञानिक लेख व्यंग्य शुभारंभ श्री अरविन्द घोष संकल्प संपादकीय संस्मरण सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' समाज सरदार वल्लभ भाई पटेल साभार सामान्य ज्ञान सियारामशरण गुप्त सुमित्रानन्दन पन्त सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' स्वागत हर्ष हिन्दी हिन्दी चिट्ठा हिन्दी दिवस हिन्दुस्तान दैनिक हिन्दुस्तान संपादकीय हूबनाथ हेमेन्द्र मिश्र

भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम संज्ञा था। उन्हीं की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थीं। वे उनसे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उनके घर आकर भोजन करें। लेकिन अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहते थे। कार्तिक शुक्ल का दिन आया। यमुना ने उस दिन यमराज को भोजन का निमंत्रण देकर उन्हें अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर दिया।

यमराज ने सोचा, मैं तो प्राणों को हरने वाला हूँ। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता है। बहन जिस स्नेह और सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। यही सोचकर यमराज ने बहन के घर जाने का निर्णय कर लिया।

यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। यमुना ने उन्हें स्नान कराकर पूजा के बाद अनेक व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से प्रसन्न होकर यमराज ने बहन को वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा, 'भाई आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई का आदर सत्कार करके टीका काढ़े, उसे तुम्हारा भय न रहे।'

यमराज ने 'तथास्तु' कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह ली। इसी दिन से इस पर्व की परम्परा बनी।

ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता है। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।


भाई - बहन के प्रेम का प्रतीक यह त्यौहार कार्तिक शुक्ल द्वितीय को मनाया जाता है। बहन से तिलक लगवाना व बहन के घर भोजन करना अति शुभ होता है। इस दिन बहन भाई की पूजा कर उसकी दीर्घायु तथा अपने सुहाग की कामना से हाथ जोड़ यमराज से प्रार्थना करती है। इस दिन सूर्य नारायण कन्या यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करवाया था। इस कारण इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। 

आप सभी पाठकों को दीपोत्सव पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। सादर  … अभिनन्दन।।


महादेवी वर्मा 
मधुर मधुर मेरे दीपक जल
युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल 
प्रियतम का पथ आलोकित कर। 

सौरभ फैला विपुल धूप बन 
मृदुल मोम सा घुल रे मृदु तन 
दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित 
तेरे जीवन का अणु गल गल। 
पुलक पुलक मेरे दीपक जल। 

सारे शीतल कोमल नूतन 
मांग रहे तुझको ज्वाला कण 
विश्वसलभ सिर धुनता कहता, 'मैं 
हाय न जल पाया तुझमें मिल !'
सिहर सिहर मेरे दीपक जल। 

जलते नभ में देख असंख्यक 
स्नेहहीन नित कितने दीपक 
जलमय सागर का उर जलता 
विद्युत से घिरता है बादल 
विहंस विहंस मेरे दीपक जल।  

द्रुम के अंग हरित कोमलतम 
ज्वाला को करते हृदयंगम 
वसुधा के जड़ अंतर में भी 
बंदी नहीं है तापों की हलचल !
बिखर बिखर मेरे दीपक जल !

मेरे निश्वासों से द्रुतवर 
सुभग न तू बुझने का भय कर 
मैं अंचल की ओट किए हूं 
अपनी मृदु पलकों से चंचल !
सहज सहज मेरे दीपक जल 

सीमा की लघुता का बंधन 
है अनादि तू मत घड़ियां गिन 
मैं दृग के अक्षय कोशों से 
तुझमें भरती हूं आंसू-जल !
सजल सजल मेरे दीपक जल 

तम असीम तेरा प्रकाश चिर 
खेलेंगे नव खेल निरंतर 
तम के अणु अणु में विद्युत सा 
अमिट चित्र अंकित करता चल !
सरल सरल मेरे दीपक जल ! 

तू जल जल होता जितना क्षय 
वह समीप आता छलनामय 
मधुर मिलन में मिट जाना तू-
उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल
मदिर मदिर मेरे दीपक जल 
प्रियतम का पथ आलोकित कर !

- महादेवी वर्मा

त्रिलोचन 
इस जीवन में रह न जाए मल 
द्वेष, दंभ, अन्याय, घृणा, छल 
चरण चरण चल गृह कर उज्जवल 
गृह गृह की लक्ष्मी मुसकाओ 

आज मुक्त कर मन के बंधन 
करो ज्योति का जय का वंदन 
स्नेह अतुल धन, धन्य यह भुवन 
बन कर स्नेह गीत लहराओ 

कर्मयोग कल तक के भूलो 
जीवन-सुमन सुरभि पर फूलो 
छवि छवि छू लो, सुख से झूलो 
जीवन की नव छवि बरसाओ 

ये अनंत के लघु लघु तारे 
दुर्बल अपनी ज्योति पसारे 
अंधकार से कभी न हारे 
प्रतिमन वही लगन सरसाओ। 


- त्रिलोचन   

फिर आ गई दिवाली की हंसती हुई यह शाम 
रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम। 

यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार 
उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार। 

यह जिंदगी के रुख पे मचलती हुई दुल्हन 
घूंघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन। 

शायर के इक तखय्युले-रंगी का है समां 
उतरी है कहकशां कहीं, होता है यह गुमां।  


- मैथिलीशरण गुप्त


मैथिलीशरण गुप्त 

यह दीप अकेला स्नेहभरा 
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। 

यह जन है: गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा ?
पनडुब्बा: ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लाएगा ?
यह समिधा: ऐसी आग हठीला विरल सुलगाएगा। 
यह अद्वितीय: यह मेरा: यह मैं स्वयं विसर्जित: 

यह दीप अकेला, स्नेहभरा 
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 

यह मधु: स्वयं काल की मौना का दु:ख संचय 
यह गोरस: जीवन कामधेनु का अमृत-पूत पय,
यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकना निर्भय 
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुत: इसको भी शक्ति दे दो।  

यह दीप अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 

यह वह विश्वास नहीं, जो अपनी लघुता में भी कांपा,
यह पीड़ा जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुलाते कडुवे तम में
यह सदा द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त नेत्र। 
उल्लंब बाहु, यह चिर अखंड अपनापा। 
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भी भक्ति को दे दो।  

यह दीप अकेला, स्नेहभरा
है गर्वभरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति दे दो। 


- सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'

हाथों में फुलझड़ी 
बहुत-से पटाके,
धम-धम, धूम-धूम 
धमा-धम धमाके 

दूर तक अनार उठा 
चरखी भी भागी,
बुझी-जली, जली-बुझी 
सोते से जागी 

रामू, बिरजू दौड़े 
नीलू भी आई,
'मुन्नी कहां, मुन्नी कहां'
बोलो तो भाई!

बंद किए कान खड़ी 
कोने में भाई,
सबने मिल फुलझड़ी 
उसको पकड़ाई 

नन्ही-सी मुन्नी 
और नन्ही-सी फुलझड़ी,
इधर-उधर देखती 
वह भी आगे बढ़ी 

- प्रयाग शुक्ल


प्रयाग शुक्ल 

भरी दुपहरी में अधियारा 
सूरज परछाई से हारा 
अंतरतम का नेह निचोड़ें -
बुझी हुई बाती सुलगाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 


हम पड़ाव को समझे मंजिल 
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल 
वर्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा 
अपनों के विघ्नों ने घेरा 
अंतिम जय का वज्र बनाने -
नव दधीची हड्डियां गलाएं 
आओ फिर से दिया जलाएं 


- अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी 
( भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, सन् 1924 ई. को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। अटल जी सफल राजनीतिज्ञ के साथ साथ एक कवि भी हैं। "मेरी इक्यावन कविताएँ" उनका प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है।)

दीपावली के इस शुभ अवसर पर "हिन्दी चिट्ठा" आपके समक्ष
17 से 23 अक्टूबर, 2014 तक 
हिन्दी कवियों की दीपावली पर केन्द्रित बेहतरीन रचनाएँ प्रस्तुत करेगा। आशा है कि आप सबको ये प्रस्तुति पसन्द आएगी। शुभ दीपावली।। सादर ... अभिनन्दन।।

डॉ. हरिवंश राय 'बच्चन' 

 है अँधेरी रात पर ,
दीवा जलाना कब मना है ?
क्या हवाएँ थीं की उजड़ा 
प्यार का वह आशियाना 
कुछ न आया काम तेरा 
शोर करना , गुल मचाना ,
नाश की उन शक्तियों के 
साथ चलता ज़ोर किसका ,
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि ,
तुझे होगा बताना जो बसे हैं 
वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से ,
पर किसी उजड़े हुए को 
फ़िर बसाना कब मना है ?
है अँधेरी रात पर 
दीवा जलाना कब मना है ?

                                   - डॉ . हरिवंश राय 'बच्चन'
loading...

योगदानकर्ता

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget