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फिर आ गई दिवाली - मैथिलीशरण गुप्त

फिर आ गई दिवाली की हंसती हुई यह शाम रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम। यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार। यह जिंदगी के रुख पे मचलती हुई दुल्हन घूंघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन। शायर के इक तखय्युले-रंगी का है समां उतरी है कहकशां कहीं, होता है यह गुमां। - मैथिलीशरण गुप्त

फिर आ गई दिवाली की हंसती हुई यह शाम 
रोशन हुए चिराग खुशी का लिए पयाम। 

यह फैलती निखरती हुई रोशनी की धार 
उम्मीद के चमन पे यह छायी हुई बहार। 

यह जिंदगी के रुख पे मचलती हुई दुल्हन 
घूंघट में जैसे कोई लजायी हुई दुल्हन। 

शायर के इक तखय्युले-रंगी का है समां 
उतरी है कहकशां कहीं, होता है यह गुमां।  


- मैथिलीशरण गुप्त


मैथिलीशरण गुप्त 

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