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January 2015
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कवि और स्वतन्त्रता सेनानी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी देश और महात्मा गाँधी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे। यह भी संयोग ही है कि 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से विख्यात कवि का देहान्त भी 30 जनवरी 1968 को उसी वक़्त हुआ, जो गाँधी जी के देहान्त का वक़्त था। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप यहाँ प्रस्तुत है उनके भांजे डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी जी का संस्मरण

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पंडित माखनलाल चतुर्वेदी
वर्ष 1967 के अंतिम तीन माह दादाजी जिला मुख्य चिकित्सालय खंडवा में भरती रहे। एक दिन सूचना मिली कि रामधारी सिंह दिनकर किसी व्याख्यानमाला में पड़ोसी कस्बे बुरहानपुर आ रहे हैं। सौभाग्य से मैं उस दिन दादाजी के समीप ही था। उन्होंने आयोजकों के समक्ष इस शर्त पर कार्यक्रम में अपने आने की पुष्टि कर दी कि उन्हें कार्यक्रम प्रारम्भ होने के पूर्व माखनलाल जी से अवश्य मिलवा दिया जाय। धवल श्वेत लंबा कुरता-पायजामा एवं दुशाला कंधे पर डाले गोधूलि बेला में दिनकर जी चिकित्सालय पहुंचे। आते ही उन्होंने दादाजी के समक्ष नमन कर कहा, 'दादा मैं दिनकर। आपकी अस्वस्थता से बड़ा चिंतित था। अब आप कैसे हैं ?' उन्होंने सिविल सर्जन और परिजनों से दादा के स्वास्थ्य की विस्तृत जानकारी ली और दादा के निकट ही कुर्सी डालकर चर्चा करते रहे। हालांकि दादाजी स्पष्ट बोल नहीं पा रहे थे, पर उनके हाव-भाव से प्रतीत हुआ कि वे काफी चैतन्य व जीवन्त अनुभव कर रहे हैं। दादा के चेहरे पर असीम उत्साह व स्फूर्ति के भावों को शब्दों में पिरो पाना मेरे लिए मुश्किल है। दिनकर जी लगभग दो घंटे दादाजी के पास रहे। उन्होंने दादाजी को कतिपय स्वरचित काव्यांश भी सुनाए, जिनमें विनोबा भावे के भूदान यज्ञ से जुड़ा यह टुकड़ा भी था -

ज़मीन दो, ज़मीन दो, ज़मीन दो, ज़मीन चाहिए। समाज के समत्व के लिए, स्वदेश के लिए, स्वराज्य के महत्व के लिए, मनुष्यता के मान के लिए, ज़मीन चाहिए कि एक दुखी किसान के लिए ज़मीन चाहिए।

दिनकर जी जैसे ही उठने को हुए, तो दादाजी के कमज़ोर हाथों ने उन्हें जोर से पकड़ लिया। शायद वे उन्हें और रोकना चाह रहे थे, पर समय की कमी और अपनी व्यस्तता बताकर दिनकर जी भरे मन से उठ खड़े हुए। दादाजी ने भी नम आंखों से उन्हें हाथ जोड़कर विदाई दी।

68 की जनवरी के अंतिम दिनों में उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया। उनका बोलना बंद हो गया था। घर के सभी सदस्य उनके आसपास रहते थे। 3-4 दिनों में वे कुछ संभले और इशारों से उन्होंने कुछ खाने की इच्छा व्यक्त की। मेरी बहनों, अरुणा व सुधा, ने छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सेब और चीकू उन्हें दिए। 29 की शाम और अगले दिन 30 जनवरी को भी यही क्रम चला। ताजे फलों से उनमें शक्ति का संचार हुआ और इशारे से उन्होंने बैठने की इच्छा जताई। दोनों बहनों के सिर पर वे दुलार से हाथ फेरते रहे। इसी बीच कमरे में लगी गाँधी जी की तस्वीर की ओर देखकर श्रद्धा से हाथ जोड़ कुछ बुदबुदाए। उनके नेत्र मानों श्रद्धावनत कुछ कह रहे थे। उन्होंने इशारे से फल मांगे। बहनों ने उन्हें चम्मच से कुछ ही टुकड़े दिए। यकायक उन्हें जोर का ठसका आया और वे बेचैन हो मेरी बहन की गोद में लुढ़क गए। बारम्बार हिलाने पर भी वे कुछ नहीं बोले और आँखें पथरा गई थीं। गोधूलि बेला में ठीक गाँधी जी के ही निर्वाण क्षणों में यानी शाम 5:30 बजे ही दादाजी परब्रह्म में लीन हो गए। अपने समूचे जीवन के साथ मृत्यु में भी उन्होंने गाँधीजी से तादात्म्य पा लिया।

- डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट       ऊषा-नागरी।

खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी-
मधु-मुकुल नवल-रस गागरी।

अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये-
तू अब तक सोयी है आली!
आँखों में भरे विहाग री।।

  जयशंकर प्रसाद     

(जयशंकर प्रसाद जी आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान रचनाकार हैं। जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी, 1890 ई. काशी (वाराणसी) में हुआ था। आज जयशंकर प्रसाद जी की 125वीं जयन्ती पर प्रस्तुत है उनकी काव्य-कृति 'लहर' से रचना 'गीत'।)

सब कुछ खत्म हो जायेगा एक दिन,
पिघलते हुए ग्लेशियर्स
हवा में घुलते जहर से 
प्रदूषित पानी 
लुप्त हो जायेंगी दुर्लभ प्रजातियां 
वन्य और जीवों की 
लील जायेगा समुद्र 
छोटे-छोटे द्वीपों को 

आँधी/सुनामी/भूकम्प 
और बाढ़ की तबाही 
मिटा देगी इन्सानी बस्तियों को.
जलता हुआ रेगिस्तान 
सुखा देगा नदियों को.

ब्लैकहोल बन कर सूर्य,
निगलता जायेगा 
एक एक कर अपने ग्रह.

मिट जायेगा 
इस तारा मंडल का नामोनिशान तक 
फिर भी खत्म नहीं होगा 
उस पल पर सब कुछ.
दूर किसी आकाशगंगा में,
अज्ञात सुदूर नक्षत्र पर 
जन्म ले रही होंगी 
जीवन की सम्भावनाएं.

प्रस्तुति - प्रभा मजूमदार
साभार - नवनीत - हिन्दी डाइजेस्ट (जून 2014)

क्या आप जानते है कि हम फोन करते हुए हैलो (Hello) ही क्यों कहते हैं?
एलेक्सजेंडर ग्राहम बेल
हम किसी को फोन करने पर हैलो ही क्यों कहते हैं? हम चाहे फोन रिसीव करें या कॉल करें। हमारा सबसे पहला शब्द होता है Hello..!!

आखिर हम इसी शब्द का इस्तेमाल क्यों करते हैं?

अगर ये कहा जाये कि यह किसी का नाम है तो आप सोच में पड़ जायेंगे!! 

लेकिन हम आपको बता दें कि, यह नाम था वैज्ञानिक एलेक्सजेंडर ग्राहम बेल की गर्लफ्रेंड मारग्रेट हैलो का था। ग्राहम बेल जिसे प्यार से हैलो कहते थे। दोस्तों ये वही ग्राहम बेल हैं जिन्होंने टेलीफोन का आविष्कार किया था। वह जब भी अपनी गर्लफ्रेंड को फोन करते तो उसे हैलो कहते थे, बस तो तब से ही यह शब्द प्रचलित हो गया।

आपको यह भी बता दें कि वैज्ञानिक एलेक्सजेंडर ग्राहम बेल ने ही "मेटल डिटेक्टर" का आविष्कार भी किया था,जिसे आज सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। उम्मीद करता हूं की आपको ये जानकारी पसन्द आई होगी..!!



प्रस्तुति :- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'
हिन्दी ब्लॉग :- लक्ष्य और मुकेश पाण्डेय "चन्दन
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