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गीत - जयशंकर प्रसाद (125वीं जयन्ती पर विशेष)

(जयशंकर प्रसाद जी आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान रचनाकार हैं। जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी, 1890 ई. काशी (वाराणसी) में हुआ था। आज जयशंकर प्रसाद जी की 125वीं जयन्ती पर प्रस्तुत है उनकी काव्य-कृति 'लहर' से रचना 'गीत'।) बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट में डुबो रही- तारा-घट ऊषा-नागरी। खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा, लो यह लतिका भी भर लायी- मधु-मुकुल नवल-रस गागरी। अधरों में राग अमन्द पिये, अलकों में मलयज बन्द किये- तू अब तक सोयी है आली! आँखों में भरे विहाग री।। - जयशंकर प्रसाद

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट       ऊषा-नागरी।

खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी-
मधु-मुकुल नवल-रस गागरी।

अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये-
तू अब तक सोयी है आली!
आँखों में भरे विहाग री।।

  जयशंकर प्रसाद     

(जयशंकर प्रसाद जी आधुनिक हिन्दी साहित्य के महान रचनाकार हैं। जयशंकर प्रसाद जी का जन्म 30 जनवरी, 1890 ई. काशी (वाराणसी) में हुआ था। आज जयशंकर प्रसाद जी की 125वीं जयन्ती पर प्रस्तुत है उनकी काव्य-कृति 'लहर' से रचना 'गीत'।)

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