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March 2015

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बलिदान से एक दिन पहले कैदी साथियों को लिखा गया अन्तिम पत्र :-

22 मार्च, 1931  
साथियों !

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन मैं एक शर्त पर जिन्दा रह सकता हूँ कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता।

मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका है और क्रान्तिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हरगिज नहीं हो सकता,

आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं, अगर मैं फाँसी से बच गया तो वे जाहिर हो जायेंगी और क्रान्ति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जायेगा या सम्भवत: मिट ही जाय लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों को भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि क्रान्ति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।  

हाँ, एक विचार भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं करा सके, अगर स्वतन्त्र जिन्दा रहा सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरत पूरी कर सकता।

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचने का नहीं आया, मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है, अब तो बड़ी बेताबी से अन्तिम परीक्षा का इन्तजार है, कामना है कि यह और नजदीक हो जाय।

आपका साथी
भगत सिंह

(प्रसिद्ध क्रान्तिकारी भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर, सन् 1907 ई. को पंजाब के लायलपुर गाँव में हुआ।  इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह था। सरदार भगत सिंह बचपन से ही क्रान्तिकारी विचारों वाले थे। बड़े होने पर ये ब्रिटिश साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते थे। चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां जैसे क्रान्तिकारियों की तरह ही भगत सिंह का नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है।  भगत सिंह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सदस्य थे। साइमन कमीशन का बहिष्कार करने के सिलसिले में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय पर पुलिस ने प्राणघातक हमला किया था, जिसके कुछ दिनों बाद लाला लाजपत राय शहीद हो गए। पुलिस अधीक्षक सांडर्स को इसके लिए जिम्मेदार मानते हुए भगत सिंह ने गोलियाँ चलाकर उसकी हत्या कर दी थी। इसी मामले में दूसरा पुलिस अफसर मिस्टफर्म भी मारा गया था। 8 अप्रैल सन् 1929 ई. को इन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर नेशनल असेम्बली में बम फेंका और इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए अपने को गिरफ्तार करवाया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च, सन् 1931 ई. को फाँसी दी गयी।

भगत सिंह समय-समय पर अपने हितैषियों को पत्र लिखते रहते थे। उन पत्रों से उनकी देशभक्ति, त्याग भावना और स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की दृढ़ कामना का परिचय मिलता है।)   

जेल में माँ से भेंट न होने पर भाई कुलबीर सिंह को पत्र :-


प्रिय भाई कुलबीर सिंह जी,
सत श्री अकाल!

मुझे यह जानकर कि एक दिन तुम माँ जी को साथ लेकर आये और मुलाकात का आदेश नहीं मिलने से निराश होकर वापस लौट गये, बहुत दु:ख हुआ। तुम्हें तो पता चल चुका था कि जेल में मुलाकात की इजाजत नहीं देते। फिर माँ जी को साथ क्यों लाये ? मैं जानता हूँ कि इस समय वे बहुत घबरायी हुई हैं, लेकिन इस घबराहट और परेशानी का क्या फायदा, नुकसान ज़रूर है, क्योंकि जब से मुझे पता चला कि वे बहुत रो रही हैं, मैं स्वयं भी बेचैन हो रहा हूँ। घबराने की कोई बात नहीं, फिर इससे कुछ मिलता भी नहीं।

सभी साहस से हालात का मुकाबला करें। आखिरकार दुनिया में दूसरे लोग भी तो हजारों मुसीबतों में फँसे हुए हैं। और फिर अगर लगातार एक बरस तक मुलाकातें करके भी तबीयत नहीं भरी तो और दो-चार मुलाकातों से भी तसल्ली न होगी। मेरा ख्याल है कि फैसले और चालान के बाद मुलाकातों से पाबन्दी हट जायेगी, लेकिन माना कि इसके बावजूद मुलाकात की इजाजत न मिले तो.……… इसलिए घबराने से क्या फायदा ?

तुम्हारा भाई,
भगत सिंह 
सेंट्रल जेल, लाहौर 
3 मार्च, 1931
  

भगत सिंह का विवाह तय कर देने के सम्बन्ध में पिता का पत्र प्राप्त करने के बाद भगत सिंह द्वारा लिखा गया पिता के नाम पत्र :-

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पूज्य पिताजी,

आपका पत्र पढ़कर बड़ा दु:ख व आश्चर्य हुआ, जब आप जैसे तपे हुए देशभक्त और धीर पुरुष भी छोटी-छोटी बातों से विचलित हो सकते हैं तो साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है?

मैं जानता हूँ मेरे यहाँ रहने से मुझे विवाह करने के लिए तरह-तरह से विवश किया जायेगा। इसलिए मैं इस स्थान को छोड़कर अन्यत्र कहीं जा रहा हूँ। आपके आशीर्वाद से एफ. ए. पास कर चुका हूँ। मैं आशा करता हूँ कि आपके आशीर्वाद और भगवान की कृपा से मुझे सफलता प्राप्त होगी।

साथ ही आपकी आज्ञा न मानने का भी मुझे अत्यन्त दु:ख है, किन्तु विवाह का बन्धन मेरे सारे कार्यक्रम को नष्ट कर देगा। इसलिए मैं विवश हूँ और आशा करता हूँ कि आप मेरी इस धृष्टता को क्षमा करेंगे।

आपका पुत्र 
भगत सिंह

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