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June 2015
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तुंगुस्का की घटना याद है आपको ! वर्ष 1908 में 30 जून को साइबेरिया में तुंगुस्का नदी से दस किलोमीटर ऊपर आसमान में एक विस्फोट हुआ था। चूंकि वहां इंसानों की बसावट नहीं थी, इसलिए जान-माल का नुकसान नहीं हुआ। पर विस्फोट के कारण 2,072 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र तबाह हो गया था। वह विस्फोट क्षुद्रग्रह के कारण हुआ था। गणनाएं बताती हैं कि यदि वह साढ़े छह घंटे के बाद पृथ्वी की सीमा में दाखिल होता, तो बर्लिन नक्शे से गायब हो जाता। यानी एक क्षुद्रग्रह व्यापक तबाही की वजह बनता। हमारी सौर प्रणाली में ऐसे न जाने कितने क्षुद्रग्रह घूमते रहते हैं। मगर कई देश इसे लेकर उदासीन हैं। क्षुद्रग्रहों को जानने और इससे धरती को बचाने के प्रति जागरूकता फैलाने को लेकर ही इस वर्ष से 30 जून को ( तुंगुस्का घटना की 107वीं बरसी पर ) ऐस्टरॉइड-डे ( Asteroid Day ) यानी क्षुद्रग्रह दिवस मनाने की शुरुआत हो रही है। यह सही है कि दुनिया भर में क्षुद्रग्रह से जुड़ी मौत के मामले काफी कम हैं। वैज्ञानिकों का भी मानना है कि इसके गिरने से किसी इंसान के मारे जाने की आशंका लाखों में एक के बराबर है। मगर यह भी सच है कि पांच से दस मीटर तक चौड़ा क्षुद्रग्रह यदि पृथ्वी की कक्षा में आ जाए, तो उससे हिरोशिमा में हुए परमाणु बम के विस्फोट के बराबर ऊर्जा निकलेगी। क्षुद्रग्रह उन खगोलीय पिंडों को कहते हैं, जो ग्रह की तरह सूर्य की परिक्रमा तो करते हैं, पर आकार में छोटा होने के कारण ग्रह नहीं माने जाते। इसलिए उन्हें लघुग्रह भी कहते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ( NASA )95 फीसदी निअर-अर्थ ऑब्जेक्ट ( Near-Earth Object ) ( पृथ्वी के नजदीक से गुजरने वाले क्षुद्रग्रह ) को भविष्य का खतरा नहीं मानती, फिर भी करीब 10 लाख ऐसे निअर-अर्थ ऑब्जेक्ट हैं, जो आकार में तुंगुस्का वाले क्षुद्रग्रह के बराबर हैं और उनमें से महज एक प्रतिशत को हो रेखांकित किया जा सका है। हालांकि अच्छी बात यह है कि दुनिया की कई सरकारें इसे पहचानने की दिशा में सक्रिय हैं और तकरीबन वे सालाना चार करोड़ से लेकर पांच करोड़ डॉलर तक खर्च कर रही हैं, जिस कारण हर वर्ष करीब 1,000 निअर अर्थ ऑब्जेक्ट खोजना संभव हो रहा है। मगर अब भी काफी काम बाकी है। ऐस्टरॉइड-डे इन्हीं प्रयासों को बढ़ाने के प्रति जागरूक बनाने की पहल है।


लेखक - हेमेन्द्र मिश्र
साभार - अमर उजाला, प्रसंगवश, पेज नं. 10, लखनऊ संस्करण । शनिवार । 27 जून 2015

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बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसीलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने कहा था या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों के तराजू पर तौलो और अपनी बुद्धिमता से सही-गलत का निर्णय करो। इन ज्ञानी पुरुषों के दिए दिव्य ज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे झुक जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपरि रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते हैं और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी। आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर कटुता व वैमनस्य की भावना पैदा कर देते हैं। यह जानते हुए कि हर विचारधारा ने, चाहे वह दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, स्त्री विमर्श या दलित विमर्श, इंसान के हितों को सर्वोपरि रखा है। हर विचारधारा में कुछ खामियां होती हैं, जो तब की स्थिति-परिस्थिति पर निर्भर करती है। पर हम उसको तथ्यों व तर्कों की कसौटी पर कसने की बजाय अंधानुकरण करें, तो यह समाज हित में नहीं।

टिप्पणीकर्ता - दीपक ओझा
ईमेल -  ojhadeepak715@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान दैनिक, 8 जून, 2015 ई. , पेज नं.- 12, मेल बॉक्स

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