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तर्क का तराजू - दीपक ओझा

बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसीलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने कहा था या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों के तराजू पर तौलो और अपनी बुद्धिमता से सही-गलत का निर्णय करो। इन ज्ञानी पुरुषों के दिए दिव्य ज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे झुक जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपरि रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं।

बुद्ध ने कहा था कि किसी बात पर इसीलिए विश्वास मत करो कि वह मेरे गुरु ने कहा था या ग्रंथ ऐसा कहते हैं। हर शब्द को तर्कों के तराजू पर तौलो और अपनी बुद्धिमता से सही-गलत का निर्णय करो। इन ज्ञानी पुरुषों के दिए दिव्य ज्ञान को छोड़कर हम उनकी प्रतिमाओं के आगे झुक जाते हैं। अपने हितों को सर्वोपरि रखकर उनके नाम पर दूसरों को उपदेश देते रहते हैं। सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम तर्कों के स्थान पर भावनात्मक हो जाते हैं और भावनात्मक होने के स्थान पर तर्कवादी। आपसी सौहार्द भुलाकर विभिन्न विचारधाराओं के नाम पर कटुता व वैमनस्य की भावना पैदा कर देते हैं। यह जानते हुए कि हर विचारधारा ने, चाहे वह दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, स्त्री विमर्श या दलित विमर्श, इंसान के हितों को सर्वोपरि रखा है। हर विचारधारा में कुछ खामियां होती हैं, जो तब की स्थिति-परिस्थिति पर निर्भर करती है। पर हम उसको तथ्यों व तर्कों की कसौटी पर कसने की बजाय अंधानुकरण करें, तो यह समाज हित में नहीं।

टिप्पणीकर्ता - दीपक ओझा
ईमेल -  ojhadeepak715@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान दैनिक, 8 जून, 2015 ई. , पेज नं.- 12, मेल बॉक्स

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यह पोस्ट आज की बुलेटिन दर्द पर जीत की मुस्कान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल है। सादर .... आभार।।

बहुत सही लि‍खा आपने

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