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बढ़ोतरी के दावे और लुप्त होते बाघ

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर उस वन्य नीति का विश्लेषण, जो आंकड़ों में ही उलझ गई है।

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर उस वन्य नीति का विश्लेषण, जो आंकड़ों में ही उलझ गई है।


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आज भले देश में वन्य जीवन के पिरामिड में सबसे ऊपर बाघों की तादाद में बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा हो, पर अभी कुछ बरस पहले की बात है, इसके लुप्त हो जाने की भविष्यवाणी की जा रही थी। देश में बाघों की गणना के लिए 2006, 2010 और 2014 में तीन बार सर्वे किए गए। पहले बाघों की तादाद 1,411 आंकी गई थी, फिर 1,706 और पिछले साल यह 2,226 तक जा पहुंची। जिस देश में बाघ अंत के कगार पर पहुंच गए हों, वहां 2,226 की संख्या गर्व का विषय है। अब बाघों की संख्या में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा है, जिस पर सहज विश्वास नहीं होता। वैसे प्रोजेक्ट टाइगर के चलते 1989 में इनकी तादाद जहां 4,300 का आंकड़ा पार कर गई, वहीं 1997 से इसमें गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ, जो आगे भी जारी रहा। कहा जाता है कि महज छह साल में इनकी संख्या घटकर 3,642 से 1,657 रह गई। लेकिन ये आंकड़े और दावे हमेशा ही संदेह से घिरे रहे।

यह सच है कि 20वीं सदी में भारत में 35,000 से ज्यादा बाघ मारे गए। इसके पीछे अंग्रेजों द्वारा बाघों का शिकार, व्यावसायिक कार्यों व औषधि के लिए बाघों की हत्या, वनों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के भवनों का तेजी से निर्माण प्रमुख कारण रहे। बाघों का शिकार, उनकी खाल का व्यापार भी जारी रहा। 80 के दशक में प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता के बाद इसके बजट में लगातार कमी की जाती रही और प्राणी उद्यानों का बजट बढ़ाया जाता रहा। यह प्राणी उद्यानों में बाघ दिखाए जाने को बढ़ावा देने और वनों में उनके संरक्षण व प्राकृतिक तौर पर उनकी तादाद बढ़ाने के प्रयासों के प्रति सरकारी उपेक्षा की नीति का प्रमाण है। अब तो केंद्र सरकार ने नेशनल पार्कों और अभयारण्यों के विकास के लिए आवंटित होने वाले फंड में भारी कटौती कर दी है। वैश्विक स्तर पर बाघ संरक्षण प्रयासों पर नजर डालें, तो पाते हैं कि 12 देशों द्वारा मिलकर बनाया गया 'ग्लोबल टाइगर फोरम', 'बाघ रक्षा सेल' और सरकारी व निजी स्तर पर चली गैर सरकारी योजनाओं में बाघों के प्राकृतिक आवास यानी वनों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया। 1987 से 1997 के बीच वन क्षेत्र काफी तेजी से घटे। एक समय बाघों का संरक्षित वन क्षेत्र तीन लाख वर्ग किलोमीटर था, जो घटकर आज आधा रह गया है। हमारे यहां बाघ संरक्षण पर प्रति किलोमीटर 7,000 रुपये, जबकि औद्योगिक रूप से अविकसित नेपाल में 60,000 रुपये खर्च किए जाते हैं।

बाघों की घटती तादाद के पीछे उनके अंगों की विश्व बाजार में लाखों की कीमत होना प्रमुख कारण है। चीन और कोरिया जैसे देशों में इनकी काफी मांग है। यही वजह है कि वनों की बात छोड़िए, सरिस्का और पन्ना के अभयारण्यों से भी बाघ गायब हुए हैं। बाघों की घटती तादाद के पीछे शिकार को न रोक पाना अहम कारण है। यह काम 'टाइगर टास्क फोर्स' के गठन के बाद भी जारी है।


लेखक - ज्ञानेन्द्र रावत ( पर्यावरण कार्यकर्ता )
साभार :- हिन्दुस्तान अखबार, पेज नं. - 12 | मुरादाबाद | बुधवार | 29 जुलाई 2015

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