हिन्दी साहित्य की रचनाओं का हिन्दी वेब ब्लॉग

September 2015
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस अटल बिहारी वाजपेयी अमर उजाला अशोक वाजपेयी इतिहास इसरो एक साल ओसामा मंजर कविता कहानी कैलाश वाजपेयी क्षुद्रग्रह गोपालदास 'नीरज' जन्म दिवस जयप्रकाश भारती जयशंकर प्रसाद जल संकट जानकारी ज्ञानेन्द्र रावत टिप्पणी डॉ . हरिवंश राय 'बच्चन' डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी तरुण विजय तीज-त्यौहार त्रिलोचन दीपावली नमस्कार नरेंद्र मोदी नववर्ष निबन्ध नेताजी सुभाष चंद्र बोस नेताजी सुभाषचंद्र बोस पत्र प्रधानमंत्री प्रभा मजूमदार प्रयाग शुक्ल प्रेरक प्रसंग प्रेरक-प्रसंग प्रेरणादायक लेख बॉक्सिंग डे भगत सिंह भगवान बुद्ध भाई दूज भारत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र मंगलयान मनोज बाजपेयी महादेवी वर्मा मार्स ऑर्बिटर मिशन मास्टर रामकुमार मुकेश पाण्डेय 'चन्दन' मैथिलीशरण गुप्त यश राजीव कटारा राजीव सक्सेना रामधारी सिंह 'दिनकर' राममोहन पाठक रिपोर्ताज लेख लोहड़ी विदेशी अखबार से विनोबा भावे विशेष विश्व हिंदी सम्मेलन विश्व हिन्दी दिवस विश्व हिन्दी दिवस सप्ताह सम्मेलन-2016 वैज्ञानिक लेख व्यंग्य शुभारंभ संकल्प संपादकीय संस्मरण सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' समाज साभार सामान्य ज्ञान सियारामशरण गुप्त सुमित्रानन्दन पन्त सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' स्वागत हर्ष हिन्दी हिन्दी चिट्ठा हिन्दी दिवस हिन्दुस्तान दैनिक हिन्दुस्तान संपादकीय हूबनाथ हेमेन्द्र मिश्र

आज मंगल को मॉम मिल गई है। जिस समय इस मिशन के नाम का संक्षेप मॉम बन गया, तो मुझे पूरा विश्वास था कि मां कभी निराश नहीं करती है। साधन बहुत कम, अनेक मर्यादाएं और उसके बावजूद इतनी बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है, वह वैज्ञानिकों के विश्वास के कारण, उनके पुरुषार्थ के कारण, उनकी प्रतिबद्धता के कारण हुई है। इसलिए हमारे देश के वैज्ञानिक अनेक-अनेक अभिनंदन के अधिकारी हैं।

मंगलयान ने मंगल तक करीब 68 करोड़ किलोमीटर की यात्रा पूरी की। हम उस हद के भी पार चले गए, जहां तक मानव के प्रयास और उसकी कल्पनाएं नहीं पहुंच पाती हैं। हम इस यान को उस रास्ते पर बहुत सटीक ढंग से ले गए, जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। सूरज की किरण को हमारे पास पहुंचने में जितना समय लगता है, उससे भी ज्यादा समय, यहां से हमारे वैज्ञानिक, उसे कुछ संकेत भेजते हैं, तो इसमें उससे भी ज्यादा समय लग जाता है। यानी कि कितने धीरज के साथ कमांड देने के बाद 12-15 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है कि गया या नहीं गया है।

मंगल ग्रह पर भेजे गए अभियानों की गणित हमारे विरुद्ध थी। अभी तक मंगल के लिए 51 अभियान चलाए गए हैं, उनमें से सिर्फ 21 ही कामयाब हुए। हम फिर भी कामयाब हो गए। दुनिया में सबको सफलता नहीं मिली। और पहली बार में तो किसी देश को नहीं मिली। इस शानदार कामयाबी के साथ इसरो का नाम दुनिया की उन तीन एजेंसियों में शामिल हो गया, जो इस लाल ग्रह पर पहुंचने में कामयाब हुईं। सिर्फ तीन साल में, यह छोटी बात नहीं है।

इसे अपने देश में ही बनाया गया। बेंगलुरु से भुवनेश्वर तक और फरीदाबाद से राजकोट तक पूरे भारत में इसके लिए प्रयास हुए। मैं अहमदाबाद इसरो में बार-बार जाता था। बड़ा मन करता था, क्या कर रहे हैं वैज्ञानिक। बेचारे, लैब से बाहर नहीं निकलते हैं, तो कोई तो जाए मिलने के लिए। मैं जाता था और तब मुझे पता चला कि मीथेन का सेंसर वहां बन रहा था और दूसरा, वहां कैमरा बन रहा था। और शायद दुनिया में मीथेन गैस की जानकारी देने का पहला काम ये आपके प्रयत्नों से होगा। हमने लागत कम रखने के लिए छोटे रॉकेट का इस्तेमाल किया, लेकिन इससे उस मिशन की जटिलता और बढ़ गई, जो पहले ही चुनौतीपूर्ण था। मैं पिछली बार जब श्रीहरिकोटा गया था, तब कहा था कि अमेरिका के हॉलीवुड में जो फिल्में बनती हैं, उससे भी कम खर्च में हमारे वैज्ञानिकों ने यह काम किया है।

अनिश्चितता हर यात्रा का हिस्सा होती है, इसका सामना हर उस यात्री को करना पड़ता है, जो लीक को तोड़ रहा है। कुछ नया पाने की भूख, कुछ नया खोजने का रोमांच, यह सब कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। मेरे सामने दो प्रस्ताव थे। जब यह सवाल आया कि आज सुबह मैं कहां रहूं? सब साइंटिस्टों ने कहा कि साहब, दुनिया में यह बहुत कठिन काम है। सफल होंगे, नहीं होंगे। आपको बुलाना, नहीं बुलाना, हमें दुविधा है। मैंने कहा, चिंता मत कीजिए। विफलता आती है, तो मेरी पहली जिम्मेवारी बनती है, इन वैज्ञानिकों के बीच आने की। यश लेने के लिए सब आते हैं। लेकिन काम भी तो मंगल था। और जब काम मंगल होता है, इरादे मंगल होते हैं, तो मंगल की यात्रा भी तो मंगल होती है।

हर सफलता के साथ नई चुनौतियां भी आती हैं, भारत के वैज्ञानिकों और नौजवानों में ऐसी हर चुनौती का जवाब देने की ताकत है। जोखिम तो हर नई खोज की फितरत ही होती है, क्योंकि आप वह करने जा रहे हैं, जो इसके पहले कभी किया ही नहीं गया। अज्ञात में छलांग लगाए बिना मानवता कभी तरक्की नहीं कर सकती थी और अंतरिक्ष तो सबसे बड़ा अज्ञात है। इस अज्ञात को खोजने का जितना उत्साह इसरो में है, उतना किसी और में नहीं। आपने अपनी मेहनत और प्रतिभा से इसे कर दिखाया, इसे संभव बना दिया। अब मेरे इसरो के वैज्ञानिकों को असंभव को संभव करने की जैसे आदत ही लग गई है। आपने विपरीत हालात के बावजूद देश को एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया।

आज हम सभी भारतीय गर्व महसूस कर रहे हैं। सीमाओं के बावजूद हमारी महत्वाकांक्षा सबसे बेहतर को पाने की है। हमारे अंतरिक्ष अभियान की सफलता इस बात का उदाहरण है कि हम क्या कर सकते हैं। यह हमें प्रेरणा देता है कि हम सर्वोत्तम को पाने की कोशिश करें। अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए कई क्षेत्रों की विशेषज्ञता की जरूरत होती है। एक अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता बहुत सारे क्षेत्रों के लिए एप्लीकेशन तैयार करती है। ऐतिहासिक तौर पर हमारा मुख्य लक्ष्य है राष्ट्र का निर्माण। अंतरिक्ष तकनीक को अंतरिक्ष एप्लीकेशंस में बदलना। आप वैज्ञानिकों ने जो काम किया है, उसको अगर हम रोजमर्रा की जिंदगी में लागू करें, तो हम जीवन बदल सकते हैं। पूरा गवर्नेंस बदल सकते हैं। हमारे प्रयास, हमारे देश के प्रशासन की गुणवत्ता, जीवन की गुणवत्ता, उपलब्धियों की गति इन सबमें बहुत बड़ा बदलाव लाने का सामर्थ्य रखते हैं। हमें अपनी उपलब्धियों को देश के हर कोने में पहुंचाना है, प्रशासन में गहराई लानी है, अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है, जीवन को सुधारना है। हम पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।

सदियों पहले आर्यभट्ट जैसे अनेक महापुरुषों ने हमें शास्त्र का ज्ञान दिया। हमें शून्य दिया। यही शून्य आज सारे जगत को गति देने का कारण बन गया है। कोई ऐसा विषय नहीं, जिसे हमारे पूर्वजों ने रास्ता बनाकर न रखा हो। इस परंपरा को निभाने के लिए हम अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। आधुनिक भारत को यह भूमिका लगातार निभानी होगी, ताकि 'जगत-गुरु भारत' बन सके। आप ही के पुरुषार्थ से तो यह होने वाला है। पश्चिम का दर्शन एक रेखा में सोचता है, जबकि पूरब की समझ यह कहती है कि ब्रह्मांड में न तो कोई पूर्ण शुरुआत है और न कोई पूर्ण अंत। एक निरंतरता है, विरक्तता के चक्र हैं और कठिनाइयों के पार पाने की कोशिशें हैं। आइए, आज की कामयाबी के बाद हम और ज्यादा उत्साह, और ज्यादा ताकत के साथ आगे बढ़ें। उन लक्ष्यों की ओर बढ़ें, जो इससे ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। जिन्हें हासिल करना इससे भी ज्यादा कठिन है। आइए, अपनी सीमाओं को और आगे ले जाएं।


भारत के प्रधानमंत्री - नरेंद्र मोदी


( प्रधानमंत्री द्वारा मार्स ऑर्बिटर मिशन ( मॉम ) की सफलता पर 24 सितम्बर, 2014 ई. को दिए गए भाषण के संपादित अंश )

तरुण विजय
मानो हम सऊदी अरब या अफ्रीका में रह रहे हों। हिंदी में कोई बड़ा नेता भाषण दे या उच्च अधिकारी फाइल पर टिप्पणी लिखे, तो खबर बन जाती है। खबर तो तब बननी चाहिए थी, जब राष्ट्रभाषा हिंदी के देश में कोई हिंदी में काम न करे या उसका विरोध करे। करीब साढ़े छह दशक के बाद भी हिंदी की दुर्दशा यह है कि शायद ही किसी पार्टी का किसी राजनीतिक दल का मूल वक्तव्य हिंदी में बनता हो। वह पहले अंग्रेजी में बनता है और फिर हिंदी में ऐसा सत्यानाशी अनुवाद होता है, जिसे पढ़कर लगता है कि इससे अच्छा था कि अनुवाद किया ही न जाता। जो पत्रकार ऐसे समाचार संस्थान में काम करते हैं, जिसमें अंग्रेजी के अखबार भी छपते हैं, तो भले ही वे हिंदी दैनिक या साप्ताहिक के पत्रकार हों, उनके परिचय पत्र अंग्रेजी में होते हैं। मामला रौब जमाने का है। हिंदी सिर्फ वोट और बाजार की भाषा है। वह भी विकृत की जा रही है। यह मजबूरी है कि हिंदी में भाषण दिए बिना वोट नहीं मिल सकते। वरना दिल्ली की पांच सितारा संस्कृति में डूब सिर्फ अंग्रेजी के विश्व में विचरण करने वाले अंग्रेजी में ही भाषण देकर वोट लेने का प्रयास करते हैं। वर्ष खत्म होने में अब चार महीने भी नहीं हैं। पिटी- पिटाई लीक के अनुसार नेताओं, अफसरों और नामी-गिरामी नागरिकों से अगर पूछा जाए कि आपने वर्ष 2015 में कौन-सी पुस्तक पढ़ी, किस लेखक ने सबसे अधिक प्रभावित किया, तो अधिकांश केवल अंग्रेजी के लेखकों और पुस्तकों के नाम बताएंगे। यह सिद्ध करने के लिए कि वे पढ़े-लिखे हैं तथा विश्वव्यापी ज्ञान से युक्त हैं। सांसद, विधायक, अफसर हों या सामान्य कामकाजी भारतीय, जहां तक प्रयास होगा, प्राण तक दांव पर लगाकर बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजता है। हिंदी पढ़-लिखकर भविष्य अच्छा होगा, ऐसा कितना लोग मानते हैं, पूछ लीजिए। बच्चों का हिंदी विद्यालयों में भेजेंगे नहीं, हिंदी की पुस्तकें पढ़ेंगे नहीं। हिंदी में सीवी यानी बायोडाटा या संक्षिप्त जीवनवृत्त किसी कंपनी को भेजने का जोखिम नहीं उठाएंगे। चार वाक्य बिना अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों के इस्तेमाल किए बोलने की क्षमता नहीं रखेंगे।

एम.ए. पीएच.डी. करेंगे, लेकिन एक पृष्ठ भी शुद्ध हिंदी लिखने की योग्यता नहीं होगी। फिर भी हिंदी का जुलूस निकालेंगे और तमिलनाडु से कहेंगे कि तुम हिंदी पढ़ो। अजीब अहंकार है।

हिंदीभाषी प्रदेशों में ही हिंदी बाजार, घर और सरकारी कार्यालयों से तिरोहित होती जा रही है। इसका कारण है कि हिंदी के माध्यम से प्रतिष्ठा और पैसा, पद और प्रोन्नति मिल सकती है, ऐसा विश्वास खत्म होता जा रहा है। किसी भी मंत्रालय अथवा कार्यालय में हिंदी में दिए गए प्रपत्र एवं अंग्रेजी में भेजे गए आवेदन पर भिन्न प्रतिक्रियाएं प्राप्त होती हैं। हिंदी अब हमारे वर्तमान और भविष्य के लिए केवल राजभाषा समितियों के औपचारिक लोकाचार एवं कभी-कभी उबाल पर आने वाले संघ लोकसेवा आयोग जैसे मुद्दों से जुड़े आंदोलनों तक सीमित होती गई है। क्या किसी ने इस बात पर प्रश्न उठाया कि अधिकांश उपभोक्ता उत्पादक टुथपेस्ट, अंग्रेजी दवाइयां, विमान के बोर्डिंग पास एवं टिकट, जूतों-चप्पलों पर छपने वाले नाम और मूल्य, कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर तथा इंटरनेट से जुड़े विषयों की जानकारी इत्यादि हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं प्राप्त होती? क्या इन सबको खरीदने या इस्तेमाल करने वाले लोग अंग्रेज हैं अथवा वे भारतीय भाषा नहीं जानते? जानते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हिंदी में अपने उत्पादों के नाम बाजार में धमक पैदा करेंगे, ऐसा माना नहीं जाता। भारत में निर्मित होने वाली कारों तथा अन्य वाहनों के नाम यूरोपीय क्यों होते हैं? भला हो संजय गांधी का, जिन्होंने जापान की सुजुकी का मारुतिकरण किया, वरना हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा में वाहन अथवा महंगे उत्पाद खरीदे जाएंगे, ऐसा भरोसा उन लोगों को नहीं है, जो ऐसी वस्तुओं के कारखाने चलाते हैं।
वास्तव में हमारा भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान ही घटता जा रहा है। ऐसे अनेक परिवार मिलेंगे, जो बड़े अहंकार के साथ बताते हैं कि उनके बच्चे हिंदी, तमिल या पंजाबी नहीं बोल पाते।

स्कूल में टीचर जी ने कहा है कि सिर्फ अंग्रेजी बोलो, ताकि अभ्यास हो जाएगा। हम किसी भी भारतीय भाषा के सम्मान के प्रति गंभीर ही नहीं हैं। ऐसे कितने उत्तर या पूर्वी क्षेत्रों के विद्यालय हैं, जहां तमिल, तेलगू, कन्नड़ या असमिया भाषाओं की महान विरासत, उनके महान साहित्यकारों और कवियों का संक्षिप्त ही सही, लेकिन परिचय दिया जाना जरूरी माना जाता है? अपने-अपने बक्सों में बंद शिक्षा और राजनीति का व्यापार भाषायी संघर्ष में तो रुचि ले सकता है, लेकिन भाषायी सेतु बनाने में किसकी रुचि है?

हिंदी की यह दुर्दशा हिंदीवालों के ही अपनी भाषा के प्रति दुर्लक्ष्य का परिणाम है। वर्षों बाद भारत को सौभाग्य से ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने देश में ही नहीं, अमेरिका से लेकर चीन तक हिंदी में भाषण देकर एवं विदेशी राष्ट्रध्यक्षों से हिंदी में बात कर राष्ट्रभाषा का गौरव बढ़ाया है। क्या उनसे कुछ सीख सकेंगे?


तरुण विजय
भाजपा के राज्यसभा सदस्य
साभार :- अमर उजाला | देशकाल | पेज नं. 16 | रविवार | 6 सितम्बर, 2015

घटना सन् 1951 की है। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद नगर में सब इंस्पेक्टर पुलिस की परीक्षा थी। प्रतियोगियों से एक प्रश्न पूछा गया-मुरादाबाद की सबसे प्रसिद्ध वस्तु का नाम बताइए? अधिकांश प्रतियोगियों ने इस प्रश्न के उत्तर में लिखा था- कलई के बर्तन। किंतु एक प्रतियोगी ने उत्तर में लिखा-मास्टर रामकुमार का कायदा। परीक्षक इस उत्तर से चकरा गया। वह मुरादाबाद के बाहर का निवासी था और सामान्य तौर पर वह भी यही जानता था कि मुरादाबाद अपने कलई के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है। किंतु रामकुमार का कायदा तो सचमुच नई चीज थी और उसने पहले इसका नाम भी न सुना था। जब उसने अपने परिचय के कई लोगों से पूछा, तो प्रतियोगी द्वारा दिया गया उत्तर ठीक पाया। आज बहुतों को यह जानने की उत्सुकता जरूर हो सकती है कि आखिर यह 'मास्टर रामकुमार का कायदा' क्या है? दरअसल, यह आजादी के दौर में देशवासियों को हिंदी वर्णमाला का बेहद सरल और व्यवस्थित ढंग से ज्ञान कराने वाली पहली सचित्र बोध पुस्तिका (प्राइमर) यानी कायदा थी। इसे मुरादाबाद नगर के शिक्षक और स्वाधीनता सेनानी मास्टर रामकुमार ने बड़े परिश्रम से तैयार कर पहली बार सन् 1915 में छापा था और उस जमाने में लागत मूल्य एक पैसा पर हिंदी के विद्यार्थियों को उपलब्ध कराया था। हिंदी वर्णमाला का अक्षर ज्ञान कराने वाली यह सचित्र प्राइमर यानी 'मास्टर रामकुमार का कायदा' जल्दी ही समूचे हिंदी जगत और भारत भर में लोकप्रिय हो गया। बेहद सरल ढंग से हिंदी के अक्षरों एवं मात्राओं का ज्ञान कराने और सबसे सस्ता होने के कारण मास्टर रामकुमार के कायदे की देशभर में इतनी ज्यादा मांग होने लगी कि स्वयं मास्टरजी के लिए इसकी पूर्ति कर पाना मुश्किल हो गया। नतीजा यह हुआ कि दूसरे मुद्रक और प्रकाशक इसकी हू-ब-हू नकल कर चोरी-छिपे छापकर इसे बेचने लगे। भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में काले-काले पन्नों वाली इस पतली सी पुस्तिका का योगदान हिंदी प्रसार को समर्पित किसी भी व्यक्ति या संस्था की तुलना में सबसे ज्यादा है। 'मास्टर रामकुमार के कायदे' के बारे में एक रोचक कथा भी है। दरअसल बीसवीं सदी के प्रारंभ में हिंदी और हिंदुस्तान के प्रति मास्टरजी के मन में गहरा अनुराग था। वे शुरुआत से ही भारत के स्वाधीनता संग्राम में शामिल हो चुके थे और हिंदी भाषा को उर्दू और अंग्रेजी की बराबरी पर लाना चाहते थे। आजादी की लड़ाई के दौरान जब वह दिग्गज राष्ट्रपुरुषों के साथ  मुरादाबाद कारागार में कैद थे, वहीं हिंदी वर्णमाला का सरल और व्यवस्थित ज्ञान कराने वाली सचित्र बोध पुस्तिका यानी कायदे की प्राक्कल्पना जन्म लेने लगी। मास्टर रामकुमार दिन-रात इसके बारे में सोचने लगे। अंतत: कुछ दिनों के श्रम के बाद उन्होंने हिंदी की पहली सचित्र बोध पुस्तिका जो आज भी 'मास्टर रामकुमार का कायदा' नाम से प्रसिद्ध है, उसे रचने में सफलता प्राप्त की। कारागार से रिहा होने के बाद मास्टर जी ने अपने कायदे को मूर्त रूप दिया। उन्होंने अपने मुद्रणालय रामकुमार प्रेस में पहला कायदा छापकर लागत मूल्य केवल एक पैसे पर हिंदी शिक्षार्थियों को इसे उपलब्ध कराया। काले पृष्ठों पर छपी इस बोध पुस्तिका की खास पहचान थी, मात्राओं का सरल ज्ञान और बारहखड़ी। 'मास्टर रामकुमार के कायदे' से पहले अन्य कोई प्राइमरी हिंदी के शिक्षार्थियों को मात्राओं का सम्यक ज्ञान नहीं करा पाती थी। नतीजा यह हुआ कि मास्टर रामकुमार का कायदा रातों-रात भारत भर में इतना लोकप्रिय हो गया कि पीतल के बर्तनों के बाद मुरादाबाद नगर की पहचान बन गया। जब प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार डॉ. रामकुमार वर्मा ने 'कायदा' पहली बार देखा तो उन्होंने इसे हिंदी की पहली प्रमाणिक बोध पुस्तिका की संज्ञा दी थी।

- राजीव सक्सेना
साभार :- अमर उजाला, 14 सितम्बर, 2014

आज भारत के महान समाज सुधारक, दार्शनिक और भूदान आन्दोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे जी की 120वीं जयन्ती है। इस उपलक्ष्य में प्रस्तुत है उनके प्रसिद्ध निबन्ध 'जीवन और शिक्षण' का एक अंश 

==============================================================

आचार्य विनोबा भावे
आज की विचित्र शिक्षा-पद्धति के कारण जीवन के दो टुकड़े हो जाते हैं। पन्द्रह से बीस वर्ष तक आदमी जीने के झंझट में न पड़कर सिर्फ शिक्षा प्राप्त करे और बाद में, शिक्षण को बस्ते में लपेटकर रख, मरने तक जिये।

यह रीति प्रकृति की योजना के विरुद्ध है। हाथ-भर लम्बाई का बालक साढ़े तीन हाथ कैसे हो जाता है, यह उसके अथवा औरों के ध्यान में भी नहीं आता। शरीर की वृद्धि रोज होती रहती है। यह वृद्धि सावकाश क्रम-क्रम से, थोड़ी-थोड़ी होती है। इसलिए उसके होने का भास तक नहीं होता। यह नहीं होता कि आज रात को सोये, तब दो फुट ऊँचाई थी और सबेरे उठकर देखा तो ढाई फुट हो गयी। आज की शिक्षण-पद्धति का तो यह ढंग है कि अमुक वर्ष के बिल्कुल आखिरी दिन तक मनुष्य, जीवन के विषय में पूर्ण रूप से गैर-जिम्मेदार रहे तो भी कोई हर्ज नहीं! यही नहीं, उसे गैर-जिम्मेदार रहना चाहिए और आगामी वर्ष का पहला दिन निकले कि सारी जिम्मेदारी उठा लेने को तैयार हो जाना चाहिए। सम्पूर्ण गैर-जिम्मेदारी से सम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान कूद ही हुई। ऐसी हनुमान कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाये, तो क्या अचरज!

भगवान ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में ही भगवद्गीता कही। पहले भगवद्गीता का 'क्लास' लेकर फिर अर्जुन को कुरुक्षेत्र में नहीं ढकेला। तभी उसे वह गीता पची। हम जिसे जीवन की तैयारी का ज्ञान कहते हैं, उसे जीवन से बिल्कुल अलिप्त रखना चाहते हैं, इसलिए उक्त ज्ञान में मौत की ही तैयारी होती है।

बीस वर्ष का उत्साही युवक अध्ययन में मग्न है। तरह-तरह के ऊँचे विचारों के महल बना रहा है। 'मैं शिवाजी महाराज की तरह मातृभूमि की सेवा करूँगा। मैं वाल्मीकि-सा कवि बनूँगा। मैं न्यूटन की तरह खोज करूँगा।' एक, दो, चार-जाने क्या क्या कल्पना करता है। ऐसी कल्पना करने का भाग्य भी थोड़े को ही मिलता है। पर जिनको मिलता है, उनकी ही बात लेते हैं। इन कल्पनाओं का क्या नतीजा निकलता है ? जब नोन-तेल-लकड़ी के फेर में पड़ा, जब पेट का प्रश्न सामने आया, तब बेचारा दीन बन जाता है। जीवन की जिम्मेदारी क्या चीज है, आजतक इसकी बिल्कुल ही कल्पना नहीं थी और अब तो पहाड़ सामने खड़ा हो गया।

मैट्रिक पास एक विद्यार्थी से पूछा - 'क्यों जी, तुम आगे क्या करोगे ?'
'आगे क्या ? कालेज में जाऊँगा।'
'ठीक है। कालेज में तो जाओगे। लेकिन उसके बाद ? यह सवाल तो बना ही रहता है।'
'सवाल तो बना रहता है। पर अभी से उसका विचार क्यों किया जाय, आगे देखा जायेगा।'
फिर तीन साल बाद विद्यार्थी से वही सवाल पूछा।
'अभी तक कोई विचार नहीं हुआ।'
'विचार नहीं हुआ, यानी ? लेकिन, विचार किया था, क्या ?'
'नहीं साहब विचार किया ही नहीं। क्या विचार करें ? कुछ सूझता ही नहीं। पर अभी डेढ़ बरस बाकी है। आगे देखा जायेगा।'
'आगे देखा जायेगा।' - ये वही शब्द है, जो तीन वर्ष पहले कहे गये थे। पर पहले की आवाज में बेफिक्री थी। आज की आवाज में थोड़ी चिन्ता की झलक थी।

फिर डेढ़ वर्ष बाद प्रश्नकर्ता ने उसी विद्यार्थी से - अथवा कहो, अब 'गृहस्थ' से - वही प्रश्न पूछा। इस बार चेहरा चिन्ताक्रान्त था। आवाज की बेफिक्री गायब थी। ततः किं ? यह शंकराचार्यजी का पूछा हुआ सनातन सवाल अब दिमाग में कसकर चक्कर लगाने लगा था। पर उसका जबाब नहीं था।

जिन्दगी की जिम्मेदारी कोई निरी मौत नहीं है और मौत कौन ऐसी बड़ी मौत है ? अनुभव के अभाव से यह सारा हौआ है। जीवन और मरण दोनों आनन्द की वस्तु होनी चाहिए। कारण, अपने परम प्रिय पिता ने-ईश्वर ने - वे हमें दिये हैं। ईश्वर ने जीवन दुखमय नहीं रचा। पर, हमें जीवन जीना आना चाहिए। कौन पिता है, जो अपने बच्चों के लिए परेशानी की जिन्दगी चाहेगा ? तिस पत ईश्वर के प्रेम और करुणा का कोई पार है ? वह अपने लाड़ले बच्चों के लिए सुखमय जीवन का निर्माण करेगा कि परेशानियों और झंझटों से भरा जीवन रचेगा ? कल्पना की क्या आवश्यकता है, प्रत्यक्ष देखिए न। हमारे लिए जो चीज जितनी जरूरी है, उसके उतनी ही सुलभता से मिलने का इन्तजाम ईश्वर की ओर से है। पानी से हवा ज्यादा जरूरी है, तो ईश्वर ने हवा की अधिक सुलभ किया है। जहाँ नाक है, वहाँ हवा मौजूद है। पानी से अन्न की जरूरत कम होने की वजह से पानी प्राप्त करने की बनिस्बत अन्न प्राप्त करने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है। ईश्वर की ऐसी प्रेम-पूर्ण योजना है। इसका ख्याल न करके हम निकम्मे, जड़ जवाहरात जमा करने में जितने जड़ बन जायें, उतनी तकलीफ हमें होगी। पर, यह हमारी जड़ता का दोष है, ईश्वर का नहीं।

जीवन अगर भयानक वस्तु हो, कलह हो, तो बच्चों को उसमें दाखिल मत करो और खुद भी मत जीओ। पर, अगर जीने लायक वस्तु हो, तो लड़को को उसमें जरूर दाखिल करो। बिना उसके उन्हें शिक्षण नहीं मिलने का। भगवद्गीता जैसे कुरुक्षेत्र में कही गयी, वैसी शिक्षा जीवन-क्षेत्र में देनी चाहिए, दी जा सकती है। 'दी जा सकती है'-यह भाषा भी ठीक नहीं है, वहीं वह मिल सकती है।

अर्जुन के सामने प्रत्यक्ष कर्तव्य करते हुए सवाल पैदा हुआ। उसका उत्तर देने के लिए 'भगवद्गीता' निर्मित हुई। इसी का नाम शिक्षा है। बच्चों को खेत में काम करने दो। वहाँ कोई सवाल पैदा हो, तो उसका उत्तर देने के लिए सृष्टि-शास्त्र अथवा पदार्थ-विज्ञान की या दूसरी चीज की जरूरत हो, उसका ज्ञान दो। यह सच्चा शिक्षण होगा। बच्चों को रसोई बनाने दो। उसमें जहाँ जरूरत हो, रसायन शास्त्र सिखाओ। पर, असली बात यह है कि उनको 'जीवन जीने' दो। व्यवहार में लाभ करने वाले आदमी को शिक्षण मिलता ही रहता है। वैसे ही छोटे बच्चे को भी मिले। भेद इतना ही होगा कि बच्चों के आसपास जरूरत के अनुसार मार्गदर्शन कराने वाले मनुष्य मौजूद हों। इसके लिए उदाहरण विद्यार्थी राम-लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र का लेना चाहिए। विश्वामित्र यज्ञ करते थे। उसकी रक्षा करने के लिए उन्होंने दशरथ से लड़कों की याचना की। उसी काम के लिए दशरथ ने लड़कों को भेजा। लड़कों में भी यह जिम्मेदारी की भावना थी कि हम यज्ञ-रक्षक के 'काम' के लिए जाते हैं। उसमें उन्हें अपूर्व शिक्षा मिली। पर, यह बताना हो कि राम-लक्ष्मण ने क्या किया, तो कहना होगा कि 'यज्ञ-रक्षा' की। 'शिक्षण प्राप्त किया', नहीं कहा जायेगा। पर, शिक्षण उन्हें मिला, जो मिलना ही था। शिक्षण कर्तव्य का, कर्म का आनुषंगिक फल है। जो कोई कर्तव्य करता है, उसे जाने-अनजाने यह मिलता है। लड़कों को भी यह उसी तरह मिलना चाहिए। औरों को यह ठोकरें खा-खाकर मिलता है। छोटे लड़कों में आज उतनी शक्ति नहीं आयी है। इसलिए उनके आसपास ऐसा वातावरण बनाना चाहिए कि वे बहुत ठोकरें न खाने पायें और धीरे-धीरे वे स्वालम्बी बनें, ऐसी अपेक्षा और योजना होनी चाहिए। 'शिक्षण फल है' और 'मा फलेषु कदाचन'-यह मर्यादा फल के लिए भी लागू है - खास शिक्षण के लिए कोई कर्म करना, यह भी काम हुआ और उसमें भी 'इदमद्यमया लब्धम्' - आज मैंने यह पाया, 'इदं प्राप्स्ये' - कल वह पाउँगा इत्यादि वासनाएँ आती ही रहती हैं। इसीलिए इस 'शिक्षण मोह' से छूटना चाहिए। इस मोह से जो छूटा, उसे सर्वोत्तम शिक्षण मिला समझना चाहिए। माँ बीमार है, उसी की सेवा करने में मुझे खूब शिक्षण मिलेगा। पर इस शिक्षण के लोभ से मुझे माता की सेवा करनी है। यह तो मेरा पवित्र कर्तव्य है, इस भावना से मुझे माता की सेवा करनी चाहिए। अथवा, माता बीमार है और उसकी सेवा करने से मेरी दूसरी चीज - जिसे मैं शिक्षण समझता हूँ - वह जाती है, तो इस शिक्षण के नष्ट होने के डर से मुझे माता की सेवा नहीं टालनी चाहिए।

प्राथमिक महत्व के जीवनोपयोगी परिश्रम को शिक्षण में स्थान मिलना चाहिए। कुछ शिक्षण-शास्त्रियों को इस पर यह कहना है कि ये परिश्रम शिक्षण की दृष्टि से ही दाखिल किये जायें, पेट भरने की दृष्टि से नहीं। आज पेट भरने का जो विकृत अर्थ प्रचलित है, उससे घबड़ाकर यह कहा जाता है और कुछ हद तक वह ठीक है। पर, मनुष्य को 'पेट' देने में ईश्वर का हेतु है। ईमानदारी से 'पेट भरना' मनुष्य साध ले, तो समाज के बहुतेरे दुख और पातक नष्ट हो जाये। इसी से मुनि ने 'योSर्थशुचि: स हि शुचि' - जो आर्थिक दृष्टि से पवित्र है, वही पवित्र है; यह यथार्थ उद्गार प्रकट किया है। 'सर्वेषामविरोधेन' कैसे जिये, इस शिक्षण में सारा शिक्षण समा जाता है। अविरोधवृत्ति से शरीर-यात्रा करना मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है। यह कर्तव्य करने से उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। इसी से शरीर-यात्रा के लिए उपयोगी परिश्रम करने को ही शास्त्रकारों ने 'यज्ञ' नाम दिया है। 'उदरभरण नोहे, जाणिजे यज्ञ कम' यह उदर-भरण नहीं है, इसर यज्ञ कर्म जान। वामन पंडित का यह वचन प्रसिद्ध है। अतः मैं शरीर यात्रा के लिए परिश्रम करता हूँ यह भावना उचित है। शरीर यात्रा से मतलब अपने साढ़े तीन हाथ के शरीर की यात्रा न समझकर समाज-शरीर की यात्रा, यह अर्थ मन में बैठाना चाहिए। मेरी शरीर-यात्रा, यानी समाज की सेवा और इसीलिए ईश्वर की पूजा इतना समीकरण दृढ़ होना चाहिए। और, इस ईश्वर-सेवा में देह खपाना मेरा कर्तव्य है और वह मुझे करना चाहिए, यह भावना हर एक में होनी चाहिए। इसलिए वह छोटे बच्चों में भी होनी चाहिए। इसके लिए अपनी शक्तिभर उन्हें जीवन में भाग लेने का मौका देना चाहिए। और जीवन को मुख्य केन्द्र बनाकर उनके आसपास आवश्यकतानुसार सारे शिक्षण की रचना करनी चाहिए।

इससे जीवन के दो खंड न होंगे। जीवन की जिम्मेदारी अचानक आ पड़ने से उत्पन्न होने वाली अड़चन पैदा न होगी। अनजाने शिक्षा मिलती रहेगी, पर 'शिक्षण का मोह' नहीं चिपकेगा और निष्काम कर्म की प्रवृत्ति होगी।

- विनोबा भावे

( संत आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितम्बर, सन् 1895 ई. में महाराष्ट्र के गगोदा ग्राम में हुआ था। इनका पूरा नाम विनायक राव भावे था। ये बड़े मेधावी छात्र थे। अपने विद्यार्थी जीवन में इन्होंने गणित और संस्कृत विषय में दक्षता प्राप्त की। आजीवन अविवाहित रहकर विनोबा भावे जी ने देश की सेवा की। बहुत दिनों तक ये महात्मा गांधी के सम्पर्क में रहे। इन्होंने सर्वोदय, बुनियादी शिक्षा और भूदान आन्दोलन के द्वारा राष्ट्र को सही मार्ग दर्शन प्रदान किया। विनोबा जी प्रवचन शैली में निबन्ध लिखते थे। इनकी प्रमुख पुस्तकें है - गीता प्रवचन, विनोबा के विचार, जीवन और शिक्षण, गाँव सुखी हम सुखी. भूदान यज्ञ आदि। इनका देहावसान 15 नवम्बर, सन् 1982 ई. को हुआ था। )

दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की दुंदभी बज चुकी है। विश्व हिंदी सम्मेलन की संकल्पना केवल एक आयोजन की खानापूरी नहीं है। मात्र एक औपचारिकता न होकर, अगला विश्व हिंदी सम्मेलन उन सभी अनुत्तरित प्रश्नों का हल ढूंढ़ने का एक ऐतिहासिक अवसर होगा, जो पिछले नौ सम्मेलन पीछे छोड़ गए हैं। आगामी 10 से 12 सितम्बर तक भोपाल में आयोजित इस सम्मेलन के लिए हिंदी को वैश्विक स्तर पर नई पहचान देने का संकल्प लिया गया है। 40 साल पहले नागपुर में पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मॉरीशस के तब के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम की उपस्थिति में 39 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने जो लक्ष्य तय किए थे, उनको अब मंजिल तक पहुंचाने का वक्त आ गया है।

उस पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के मराठीभाषी सूत्रधार अनंत गोपाल शेवड़े के प्रयासों से अगले ही वर्ष 1976 में मॉरीशस में दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ था। इसका उद्घाटन करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विश्व मंच पर हिंदी को स्थापित करने के लिए हर तरह के सहयोग की वचनबद्धता व्यक्त की थी। सम्मेलन का मॉरीशस में होना और उसके प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम की सम्मेलन में मौजूदगी हिंदी के विश्व भाषा होने की कहानी कह रही थी। सम्मेलन में उन्होंने मॉरीशस को हिंदी का वैश्विक केंद्र बनाने की बात कही थी। मॉरीशस के हिंदी-भोजपुरी प्रेम को ध्यान में रखकर ही वहां विश्व हिंदी सचिवालय की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हाल की मॉरीशस यात्रा में प्लेन्स विलियम्स के फीनिक्स नगर में रखी।

इसके बाद नई दिल्ली में तीसरे और पोर्ट लुईस (मॉरीशस) में हुए चौथे विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी और हिंदी  प्रेमियों की तंद्रा टूटती हुई दिखाई पड़ी। त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में आयोजित पांचवें विश्व हिंदी सम्मेलन ने हिंदी की मुहिम को नई जागृति प्रदान की। साल 1999 में लंदन और 2003 में पारामारीबो, सुरीनाम में आयोजित सम्मेलन हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में मील का पत्थर भले ही साबित नहीं हो सके, पर हिंदी की प्रगति में इन सम्मेलनों का ऐतिहासिक अवदान रहा। इस दिशा में न्यूयॉर्क ( अमेरिका ) में संपन्न वर्ष 2007 का सम्मेलन दुनिया के हिंदी प्रेमियों और साधकों में नए उत्साह का संचार करने में बेशक कामयाब रहा। सम्मेलन के प्रस्तावों को मूर्त रूप देने के लिए विश्व स्तर पर समर्पित नए हिंदीसेवी और हिंदी संस्थाएं सामने आईं। विभिन्न देशों में कई प्रकाशक भी सामने आए।

दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहानिसबर्ग में साल 2012 में हुए सम्मेलन का स्वरूप और फलक काफी विस्तृत रहा वहां जो प्रस्ताव पारित हुए और जो प्रतिबद्धता सम्मेलन के बाद के तीन वर्षों में अब तक दिखाई पड़ी है, वह इस सम्मेलन   की सकारात्मकता बताती है। अफ्रीका से भारत और खासकर महात्मा गांधी के जीवंत संबंधों के साथ ही अन्य कारणों से हिंदी के प्रति जो भावनात्मक प्रतिक्रिया वहां दिखी, वह तो हिंदी की यात्रा की ऐतिहासिक थाती बन गई।

जोहानिसबर्ग सम्मेलन का संकल्प था- युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति ऐसा भाव पैदा करना, जिससे सूचना-प्रौद्योगिकी के उपकरणों व माध्यमों, जैसे मीडिया, सोशल मीडिया, फिल्म, वाणिज्य-व्यापार तथा बाजार में हिंदी का प्रयोग बढ़े। महात्मा गांधी की सोच के अनुसार हिंदी वैश्वीकरण की दिशा में मौलिक प्रयासों पर दिया गया। केंद्रीय हिंदी संस्थान ( आगरा ) की हिंदी के प्रचार-प्रसार व प्रशिक्षण में भूमिका की सराहना करते हुए इसके कार्यों को और आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।

पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रस्तावों के क्रम में मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना महत्वपूर्ण उपलब्धि अवश्य है, पर इसकी भूमिका व कार्यप्रणाली में स्पष्टता और पूर्ण सक्रियता के अभाव को दूर करना आवश्यक है। विदेशी छात्रों के लिए लघु हिंदी पाठ्यक्रमों, हिंदी लेखकों के प्रोत्साहन, उनकी रचनाओं के प्रकाशन, हिंदी और हिंदी विद्वानों का डाटाबेस तैयार करने, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में हिंदी भाषा संबंधी तकनीकी के विकास, विदेशियों के हिंदी प्रशिक्षण के लिए मानक पाठ्यक्रम तैयार करने, देवनागरी के लिए उपयुक्त ( फॉण्ट संबंधी समस्याओं के निराकरण सहित ) सॉफ्टवेयर विकसित करने तथा विषयगत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलनों के आयोजन संबंधी नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रस्तावों को मूर्त रूप देना अभी शेष है।

अब तक संपन्न नौ विश्व हिंदी सम्मेलनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्प हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में स्थापित करना रहा है। इस दिशा में भारत सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दृढ़ संकल्प सामने आया है। विदेश मंत्रालय की मंत्रालय स्तरीय हिंदी समिति में उन्होंने यह संकल्प व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के 197 सदस्यों में से दो-तिहाई का समर्थन मिलने पर सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता और उसके परिणामी लक्ष्य के रूप में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के प्रयास जारी हैं। हिंदी को विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में यद्यपि काफी व्यय आएगा, लेकिन भारत इस कार्य में कभी पीछे नहीं रहेगा। इस संकल्प के साथ आयोजित हो रहे दसवें भोपाल विश्व हिंदी सम्मेलन से हिंदी प्रेमियों को बड़ी आशाएं हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन सिर्फ एक जलसा नहीं है। यह अपनी पीठ थपथपाने का मौका भी नहीं है, इसे तो आत्मनिरीक्षण और आत्मालोचन का अवसर होना चाहिए। यह सोचने का भी कि 68 वर्षों के लोकतांत्रिक भारत में अब भी अपनी भाषा के पूर्ण मुखरित-पल्लवित होने की बाट देश क्यों जोह रहा है? हिंदी सम्मेलनों के अब तक के सभी प्रस्तावों की सूक्ष्म समीक्षा या ऑडिट आवश्यक है। इसके बाद आगे का रास्ता तय करना होगा। लेकिन यह कठिन काम करेगा कौन? सम्मेलन आयोजित करने वाले सम्मेलन के आखिरी दिन के रस्मी गुणगान और अपनी पीठ थपथपाने में लगे होंगे। लेकिन सम्मेलन की ऊर्जा से लबरेज उत्साही राष्ट्रभाषा-राजभाषा-मातृभाषा के संकल्पवान लोगों की ऊर्जा को फर्ज अदायगी की तरह अगले सम्मेलन तक के लिए मुल्तवी करने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होंगे, बल्कि अगले सम्मेलन तक की विस्तृत कार्ययोजना को मूर्त रूप देना बड़ी चुनौती होगी। यह चुनौती हिंदी प्रेमियों के सामने भी है, और हिंदी के लिए अभूतपूर्व ऊर्जा से लैस वर्तमान केंद्र सरकार के सामने भी। दोनों मिलकर चलें, तो कम से कम शत-प्रतिशत सरकारी कामकाज हिंदी में हो सकेंगे और हिंदी संपर्क भाषा के रूप में पूरे भारत में प्रतिष्ठित हो पाएगी। आशा की जानी चाहिए कि अगला विश्व हिंदी सम्मेलन इन संकल्पों के प्रति समर्पण के साथ निरंतर चलते रहने का मंत्र और इसके लिए अनंत ऊर्जा प्रदान करेगा।

लेखक - राममोहन पाठक
सदस्य, राजभाषा हिंदी समिति, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार

साभार - हिन्दुस्तान दैनिक, पेज नं. - 12 | मुरादाबाद | सोमवार22 जून 2015

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल।।


करहु बिलम्ब न भ्रात अब उठहु मिटावहु शूल।
निज भाषा उन्नति करहु प्रथम जो सब को मूल।।


प्रचलित करहु जहान में निज भाषा करि जत्न।
राज काज दरबार में फैलावहु यह रत्न।।


सुतसो तिय सो मीत सो भृत्यन सो दिन रात।
जो भाषा मधि कीजिए निज मन की बहु बात।।


निज भाषा निज धरम निज मान करम व्यवहार।
सबै बढ़ावहु बेगि मिलि कहत पुकार-पुकार।।


पढ़ो लिखो कोउ लाख विध भाषा बहुत प्रकार।
पै जबही कछु सोचिहो निज भाषा अनुसार।।


अंग्रेजी पढ़ि के जद्यपि सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन रहत हीन के हीन।।


- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल', 'विद्या सुन्दर', 'रत्नावली', 'मुद्राराक्षस', 'भारत जननी', 'दुर्लभ बंधु', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'प्रेम जोगिनी', 'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा', 'लीलावती' एवं 'दिल्ली दरबार दर्पण' आदि हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। भारतेन्दु जी का निधन 6 जनवरी, सन् 1885 ई. को चौंतीस वर्ष चार महीने की अल्पायु में ही हो गया था। )

जगत में घर की फूट बुरी।
घर के फूटहिं सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी।।


फूटहिं सों सत कौरव नासे भारत युद्ध भयो।
जाको घाटो या भारत में अबलौं नहिं पुजयो।।


फूटहिं सो जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम।
जाको फल अब लौं भोगत सब आरज होइ गुलाम।


फूटहिं सों नवनन्द विनासो गयो मगध को राज।
चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सह साज।।


जो जंग में धन मान और बल अपुनी राखन होय।
तो अपुने घर में भूले हू फूट करौ जनि कोय।।


- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल', 'विद्या सुन्दर', 'रत्नावली', 'मुद्राराक्षस', 'भारत जननी', 'दुर्लभ बंधु', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'प्रेम जोगिनी', 'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा', 'लीलावती' एवं 'दिल्ली दरबार दर्पण' आदि हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। भारतेन्दु जी का निधन 6 जनवरी, सन् 1885 ई. को चौंतीस वर्ष चार महीने की अल्पायु में ही हो गया था। )

'भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?' निबन्ध दिसम्बर, सन् 1884 ई. में बलिया के ददरी मेले के अवसर पर आर्य देशोपकारणी सभा में भाषण देने के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के द्वारा लिखा गया था। इसमें लेखक ने कुरीतियों और अंधविश्वासों को त्यागकर अच्छी-से-अच्छी शिक्षा प्राप्त करने, उद्योग-धंधों को विकसित करने, सहयोग एवं एकता पर बल देने तथा सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा दी है।

============================================================
 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
आज बड़े आनन्द का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाय वही बहुत है। हमारे हिन्दुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं। यद्यपि फर्स्ट क्लास, सेकेण्ड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजन सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिन्दुस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए 'का चुप साधि रहा बलवाना' फिर देखिए हनुमान जी को अपना बल कैसे याद आता है। सो बल कौन याद दिलावे। या हिन्दुस्तानी राजेमहाराजे, नवाब, रईस या हाकिम। राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुट्टी नहीं। हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बाल घुड़दौड़ थियेटर में समय लगा। कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गन्दे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवें। बस वही मसल रही। "तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने गम से कब खाली। चलो बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली।"

पहले भी जब आर्य लोग हिन्दुस्तान में आकर बसे थे राजा और ब्राह्मणों के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावें और अब भी ये लोग चाहें तो हिन्दुस्तान प्रतिदिन क्या प्रतिछिन बढ़े। पर इन्हीं लोगों को निकम्मेपन ने घेर रखा है।

हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जबकि इनके पुरखों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठ करके बाँस की नालियों से जो ताराग्रह आदि बेध करके उनकी गति लिखी है वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपये के लागत की विलायत में जो दूरबीन बनी है उनसे उन ग्रहों को बेध करने में भी वही गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अंगरेजी विद्या के और जनता की उन्नति से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं तब हम लोग निरी चुंगी के कतवार फेंकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन अंगरेज फरासीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं। सबके जी में यही है कि पाला हमी पहले छू लें। उस समय हिन्दू काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं। इनको औरों को जाने दीजिए जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देख करके भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जायेगा फिर कोटि उपाय किये भी आगे न बढ़ सकेगा। इस लूट में इस बरसात में भी जिसके सिर पर कम्बख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।

मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर कुछ कहो कि हिन्दुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है।
भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ? भागवत में एक श्लोक है, 'नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारं मयाSनुकूलेन नभः स्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा।" भगवान् कहते हैं कि पहले तो मनुष्य-जन्म ही बड़ा दुर्लभ है सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और उस पर मेरी अनुकूलता इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार सागर के पार न जाय उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए। वही दशा इस समय हिन्दुस्तान की है।

बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती है बाबा हम क्या उन्नति करें। तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है। यह कहना उनकी बहुत भूल है। इंग्लैण्ड का पेट भी कभी यों ही खाली था। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा दूसरे हाथ से उन्नति के काँटों को साफ किया, क्या इंग्लैण्ड में किसान खेतवाले, गाड़ीवाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी भी देश में सभी पेट भरे हुए नहीं होते। किन्तु वे लोग जहाँ खेत जोते-बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी कौन नयी कल या मसाला बनावें जिसमें इस खेत में आगे से दून अन्न उपजे। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पियेगा व गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। 'वहाँ के लोग गप्प में ही देश के प्रबन्ध छाँटते हैं।' सिद्धान्त यह है कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धान्त है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाये। उसके बदले यहाँ के लोगों को जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है, आलस यहाँ इतनी बढ़ गयी है कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला---- "अजगर करे न चाकरी पंछी करै न काम। दास मलूका कहि गये सबके दाता राम।" चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करनेवालों की ही चारों ओर बढ़ती है, रोजगार कहीं कुछ भी नहीं। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है। किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुम्बी इस तरह अपनी इज्जत को बचाता फिरता है जैसे लाजवती बहू फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाये जाती है। वही दशा हिन्दुस्तान की है। मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। सो अब बिना ऐसा उपाय किये काम नहीं चलेगा कि रुपया भी बढ़े। और वह रुपया बिना बुद्धि बढ़े न बढ़ेगा। भाइयों राजा-महाराजाओं का मुँह मत देखो, मत यह आशा रखो कि पंडित जी कथा में ऐसा उपाय बतलावेंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े। तुम आप कमर कसो, आलस छोड़ो, कब तक अपने को जंगली हूस मूर्ख बोदे डरपोकने पुकरवाओगे। दौड़ों इस घुड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं। 'फिर कब राम जनकपुर ऐहैं' अबकि पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे।

अब भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो। और वह सुधारना ऐसा भी होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोजगार में, शिष्टाचार में, चालचलन में, शरीर में, बल में, समाज में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब अवस्था, सब जाति, सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों। चाहे तुम्हें लोग निकम्मा कहें या नंगा कहें, कृस्तान कहें या भ्रष्ट कहें, तुम केवल अपने देश की दीन दशा को देखो और उनकी बात मत सुनो। "अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः स्वकार्यं साधयेत् धीमान् कार्यध्वंसो हि मूर्खता।" जो लोग अपने को देश हितैषी लगाते हों वह अपने सुख को होम करके धन और मान का बलिदान करके कमर कसके उठो। देखा-देखी थोड़े दिन में सब हो जायेगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़ में, कोई देश की चाल की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं। उन चोरों को वहाँ से पकड़कर लाओ। उनको बांधकर कैद करो। इस समय जो जो बातें तुम्हारी उन्नति पथ की काँटा हों उनकी जड़ खोदकर फेंक दो।

अब यह प्रश्न होगा कि भाई हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधारना किस चिड़िया का नाम है? किसको अच्छा समझें। क्या लें क्या छोड़ें? तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता से मेरे ध्यान में आती हैं उनको मैं कहता हूँ, सुनो----

सब उन्नतियों का मूल धर्म है। इससे सबसे पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो अंगरेजों की धर्मनीति राजनीति परस्पर मिली हैं इससे उनकी दिन दिन कैसी उन्नति है। उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो। तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति समाज-गठन वैद्यक आदि भरे हुए हैं। दो एक मिसाल सुनो। यहीं तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्थान क्यों बनाया गया है। जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते दस-दस पाँच-पाँच कोस से वे लोग एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक दूसरे का दुःख-सुख जानें। गृहस्थी के काम की वह चीजें जो गाँव में नहीं मिलतीं यहाँ से ले जायँ। एकादशी का व्रत क्यों रखा है? जिसमें महीने में दो उपवास से शरीर शुद्ध हो जाय। गंगा जी नहाने जाते हैं तो पहले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर पर डालने का विधान क्यों है? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़ाकर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इस हेतु है कि इसी बहाने साल भर में एक बेर तो सफाई हो जाये। होली इसी हेतु है कि वसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि जलने से स्वच्छ हो जाय। यही तिहवार ही तुम्हारी म्युनिसिपालिटी है। ऐसे सब पर्व सब तीर्थव्रत आदि में कोई हिकमत है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में भई है वह यह है कि उन लोगों ने यह धर्म क्यों मान लिए थे इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयों, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है।

ये सब तो समाज धर्म हैं। जो देश काल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं। दूसरी खराबी यह हुई है कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप दादों का मतलब न समझकर बहुत से नये-नये धर्म बनाकर शास्त्रों में धर दिये। बस सभी तिथि व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गये। सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनायी और उनमें जो देश और काल के अनुकूल और उपकारी हों उनको ग्रहण कीजिए। बहुत सी बातें जो समाज विरुद्ध मानी जाती हैं किन्तु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है उनको चलाइए। जैसे जहाज का सफर विधवा विवाह आदि। लड़कों को छोटेपन में ही ब्याह करके उनका बल, बीरज, आयुष्य सब मत घटाइए। आप उनके माँ बाप हैं या शत्रु हैं। वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए। नोन तेल लकड़ी की फिक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए। तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन प्रथा बहु विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइये किन्तु इस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ायी जाती हैं, जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुल धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। नाना प्रकार के मत के लोग आपस में बैर छोड़ दें, यह समय इन झगड़ों का नहीं, हिन्दू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए, जाति में कोई चाहे ऊँचा हो, चाहे नीचा हो सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसे वैसा मानिए। छोटी जाति के लोगों का तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए।

अपने लड़कों को अच्छी से अच्छी तालीम दो। पिनशिन और वजीफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोजगार सिखलाओ। विलायत भेजो। छोटेपन से मेहनत करने की आदत दिलाओ। बंगाली, मरट्ठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्राह्मण, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढ़े तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहे वह करो। देखो जैसे हजार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली है वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंग्लैण्ड, फरासीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती है। दियासलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। जरा अपने को देखों। तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बनी है। जिस लंकलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैण्ड का है। फरासीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो। और जर्मनी की बनी चरखी की बत्ती तुम्हारे सामने जल रही है। यह तो वही मसल हुई एक बेफीकरे मंगनी का कपड़ा पहनकर किसी महफिल में गये। कपड़े को पहचान कर एक ने कहा अजी अंगा तो फलाने का है। दूसरा बोला अजी टोपी भी फलाने की है तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि घर की तो मूंछैं ही मूंछ हैं। हाय, अफसोस, तुम ऐसे हो गये कि अपने निज की काम की वस्तु भी नहीं बना सकते। भाइयों, अब तो नींद से चौकों, अपने देश की सब प्रकार से उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो। परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।

- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल', 'विद्या सुन्दर', 'रत्नावली', 'मुद्राराक्षस', 'भारत जननी', 'दुर्लभ बंधु', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'प्रेम जोगिनी', 'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा', 'लीलावती' एवं 'दिल्ली दरबार दर्पण' आदि हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। भारतेन्दु जी का निधन 6 जनवरी, सन् 1885 ई. को चौंतीस वर्ष चार महीने की अल्पायु में ही हो गया था। )

उस दिन बड़े सवेरे श्यामू की नींद खुली तो उसने देखा घर भर में कुहराम मचा हुआ है। उसकी माँ नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा ओढ़े हुए कम्बल पर भूमि-शयन कर रही है और घर के सब लोग उसे घेर कर बड़े करुण स्वर में विलाप कर रहे हैं।
लोग जब उसकी माँ को श्मशान ले जाने के लिए उठाने लगे तब श्यामू ने बड़ा उपद्रव मचाया। लोगों के हाथ से छूटकर वह माँ के ऊपर जा गिरा। बोला, काकी सो रही हैं। इसे इस तरह उठा कर कहाँ ले जा रहे हो? मैं इसे न ले जाने दूँगा।
लोगों ने बड़ी कठिनाई से उसे हटाया। काकी के अग्नि-संस्कार में भी वह न जा सका। एक दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही।
यद्यपि बुद्धिमान गुरुजनों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी काकी उसके मामा के यहाँ गयी है परन्तु यह बात उससे छिपी न रह सकी कि काकी और कहीं नहीं ऊपर राम के यहाँ गयी है। काकी के लिए कई दिन लगातार रोते-रोते उसका रुदन तो धीरे-धीरे शान्त हो गया परन्तु शोक शान्त न हो सका। वह प्रायः अकेला बैठा-बैठा शून्य मन से आकाश की ओर ताका करता।
एक दिन उसने ऊपर एक पतंग उड़ती देखी। न जाने क्या सोचकर उसका हृदय एकदम खिल उठा। पिता के पास जाकर बोला, 'काका, मुझे एक पतंग मँगा दो, अभी मँगा दो।'
पत्नी की मृत्यु के बाद विश्वेश्वर बहुत अनमने से रहते थे। 'अच्छा मँगा दूँगा,' कहकर वे उदास भाव से और कहीं चले गये।
श्यामू पतंग के लिए बहुत उत्कंठित था। वह अपनी इच्छा को किसी तरह न रोक सका। एक जगह खूँटी पर विश्वेश्वर का कोट टँगा था। इधर-उधर देखकर उसके पास स्टूल सरका कर रखा और ऊपर चढ़कर कोट की जेबें टटोली।
एक चवन्नी पाकर वह तुरन्त वहाँ से भाग गया। सुखिया दासी का लड़का भोला, श्यामू का साथी था। श्यामू ने उसे चवन्नी देकर कहा, 'अपनी जीजी से कहकर गुपचुप एक पतंग और डोर मँगा दो। देखो अकेले में लाना कोई जान न पाये।'
पतंग आयी। एक अँधेरे घर में उसमें डोर बाँधी जाने लगी। श्यामू ने धीरे से कहा, 'भोला, किसी से न कहो तो एक बात कहूँ।'
भोला ने सिर हिलाकर कहा, 'नहीं, किसी से न कहूँगा।'
श्यामू ने, रहस्य खोला, 'मैं यह पतंग ऊपर राम के यहाँ भेजूँगा। इसको पकड़ कर काकी नीचे उतरेगी। मैं लिखना नहीं जानता नहीं तो इस पर उसका नाम लिख देता।'
भोला श्यामू से अधिक समझदार था। उसने कहा, 'बात तो बहुत अच्छी सोची, परन्तु एक कठिनाई है। यह डोर पतली है। इसे पकड़ कर काकी उतर नहीं सकती। इसके टूट जाने का डर है। पतंग में मोटी रस्सी हो तो सब ठीक हो जाये।'
श्यामू गम्भीर हो गया। मतलब यह बात लाख रुपये की सुझायी गयी, परन्तु कठिनाई यह थी मोटी रस्सी कैसे मँगायी जाय। पास में दाम है नहीं और घर के जो आदमी उसकी काकी को बिना दया-माया के जला आये हैं, वे उसे इस काम के लिए कुछ देंगे नहीं। उस दिन श्यामू को चिन्ता के मारे बड़ी रात तक नींद नहीं आयी।
पहले दिन की ही तरकीब से दूसरे दिन फिर उसने पिता के कोट से एक रुपया निकाला। ले जाकर भोला को दिया और बोला, 'देख भोला, किसी को मालूम न होने पाये। अच्छी-अच्छी दो रस्सियाँ मँगा दे। एक रस्सी छोटी पड़ेगी। जवाहिर भैया से मैं एक कागज पर 'काकी' लिखवा लूँगा। नाम लिखा रहेगा तो पतंग ठीक उन्हीं के पास पहुँच जायेगी।'
दो घंटे बाद प्रफुल्ल मन से श्यामू और भोला अँधेरी कोठरी में बैठे हुए पतंग में रस्सी बाँध रहे थे। अकस्मात् उग्र रूप धारण किये हुए विश्वेश्वर शुभ कार्य में विघ्न की तरह वहाँ जा घुसे। भोला और श्यामू को धमका कर बोले- 'तुमने हमारे कोट से रुपया निकाला है।'
भोला एक ही डाँट में मुखबिर हो गया। बोला, 'श्यामू भैया ने रस्सी और पतंग माँगने के लिए निकाला था।'
विश्वेश्वर ने श्यामू को दो तमाचे जड़कर कहा, 'चोरी सीख कर जेल जायेगा। अच्छा तुझे आज अच्छी तरह बताता हूँ।'
कहकर कई तमाचे जड़े और कान मलने के बाद पतंग फाड़ डाली। अब रस्सियों की देखकर पूछा 'ये किसने मँगायी।'
भोला ने कहा, 'इन्होंने मँगायी थी। कहते थे, इससे पतंग तानकर काकी को राम के यहाँ से नीचे उतारेंगे।'
विश्वेश्वर हतबुद्धि होकर वहीं खड़े रह गये। उन्होंने फटी हुई पतंग उठाकर देखी। उस पर चिपके हुए कागज पर लिखा था .........................'काकी'।

- सियारामशरण गुप्त



सियारामशरण गुप्त 
( प्रस्तुत कहानी 'काकी' में एक अबोध बालक का अपनी माँ के प्रति गहरा प्रेम प्रकट हुआ है। प्रस्तुत कहानी के रचनाकार सियारामशरण गुप्त जी का जन्म 4 सितम्बर, सन् 1885 ई. को चिरगाँव झाँसी में हुआ था। इन्होंने हिन्दी साहित्य में कविता, उपन्यास और निबन्ध की रचना की है। गुप्त जी की कविताओं में सामाजिक विसंगतियों पर क्षोभ, गाँधीवादी आदर्श, प्रकृति प्रेम और राष्ट्रीयता है। इनके उपन्यासों में नारी की सहनशीलता, आदर्श और सरलता है। इनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'मौर्य विजय', 'दूर्वादल', 'आत्मोत्सर्ग', 'गोद', 'नारी' आदि है। )

बनारसी साड़ियाँ खरीदें केवल - Laethnic.com/sarees

योगदानकर्ता

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget