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घर की फूट बुरी - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

जगत में घर की फूट बुरी। घर के फूटहिं सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी।। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे।

जगत में घर की फूट बुरी।
घर के फूटहिं सों बिनसाई सुबरन लंकपुरी।।


फूटहिं सों सत कौरव नासे भारत युद्ध भयो।
जाको घाटो या भारत में अबलौं नहिं पुजयो।।


फूटहिं सो जयचन्द बुलायो जवनन भारत धाम।
जाको फल अब लौं भोगत सब आरज होइ गुलाम।


फूटहिं सों नवनन्द विनासो गयो मगध को राज।
चन्द्रगुप्त को नासन चाह्यो आपु नसे सह साज।।


जो जंग में धन मान और बल अपुनी राखन होय।
तो अपुने घर में भूले हू फूट करौ जनि कोय।।


- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल', 'विद्या सुन्दर', 'रत्नावली', 'मुद्राराक्षस', 'भारत जननी', 'दुर्लभ बंधु', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'प्रेम जोगिनी', 'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा', 'लीलावती' एवं 'दिल्ली दरबार दर्पण' आदि हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। भारतेन्दु जी का निधन 6 जनवरी, सन् 1885 ई. को चौंतीस वर्ष चार महीने की अल्पायु में ही हो गया था। )

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