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हिंदी को विश्व भाषा बनाने की चुनौती - राममोहन पाठक

हिंदी को पूरी दुनिया में प्रयोग लायक भाषा बनाने के लिए उन संकल्पों को मजबूत बनाना होगा, जो विश्व हिंदी सम्मेलनों में लिए गए।

दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन की दुंदभी बज चुकी है। विश्व हिंदी सम्मेलन की संकल्पना केवल एक आयोजन की खानापूरी नहीं है। मात्र एक औपचारिकता न होकर, अगला विश्व हिंदी सम्मेलन उन सभी अनुत्तरित प्रश्नों का हल ढूंढ़ने का एक ऐतिहासिक अवसर होगा, जो पिछले नौ सम्मेलन पीछे छोड़ गए हैं। आगामी 10 से 12 सितम्बर तक भोपाल में आयोजित इस सम्मेलन के लिए हिंदी को वैश्विक स्तर पर नई पहचान देने का संकल्प लिया गया है। 40 साल पहले नागपुर में पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मॉरीशस के तब के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम की उपस्थिति में 39 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने जो लक्ष्य तय किए थे, उनको अब मंजिल तक पहुंचाने का वक्त आ गया है।

उस पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के मराठीभाषी सूत्रधार अनंत गोपाल शेवड़े के प्रयासों से अगले ही वर्ष 1976 में मॉरीशस में दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ था। इसका उद्घाटन करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विश्व मंच पर हिंदी को स्थापित करने के लिए हर तरह के सहयोग की वचनबद्धता व्यक्त की थी। सम्मेलन का मॉरीशस में होना और उसके प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम की सम्मेलन में मौजूदगी हिंदी के विश्व भाषा होने की कहानी कह रही थी। सम्मेलन में उन्होंने मॉरीशस को हिंदी का वैश्विक केंद्र बनाने की बात कही थी। मॉरीशस के हिंदी-भोजपुरी प्रेम को ध्यान में रखकर ही वहां विश्व हिंदी सचिवालय की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हाल की मॉरीशस यात्रा में प्लेन्स विलियम्स के फीनिक्स नगर में रखी।

इसके बाद नई दिल्ली में तीसरे और पोर्ट लुईस (मॉरीशस) में हुए चौथे विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी और हिंदी  प्रेमियों की तंद्रा टूटती हुई दिखाई पड़ी। त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में आयोजित पांचवें विश्व हिंदी सम्मेलन ने हिंदी की मुहिम को नई जागृति प्रदान की। साल 1999 में लंदन और 2003 में पारामारीबो, सुरीनाम में आयोजित सम्मेलन हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में मील का पत्थर भले ही साबित नहीं हो सके, पर हिंदी की प्रगति में इन सम्मेलनों का ऐतिहासिक अवदान रहा। इस दिशा में न्यूयॉर्क ( अमेरिका ) में संपन्न वर्ष 2007 का सम्मेलन दुनिया के हिंदी प्रेमियों और साधकों में नए उत्साह का संचार करने में बेशक कामयाब रहा। सम्मेलन के प्रस्तावों को मूर्त रूप देने के लिए विश्व स्तर पर समर्पित नए हिंदीसेवी और हिंदी संस्थाएं सामने आईं। विभिन्न देशों में कई प्रकाशक भी सामने आए।

दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहानिसबर्ग में साल 2012 में हुए सम्मेलन का स्वरूप और फलक काफी विस्तृत रहा वहां जो प्रस्ताव पारित हुए और जो प्रतिबद्धता सम्मेलन के बाद के तीन वर्षों में अब तक दिखाई पड़ी है, वह इस सम्मेलन   की सकारात्मकता बताती है। अफ्रीका से भारत और खासकर महात्मा गांधी के जीवंत संबंधों के साथ ही अन्य कारणों से हिंदी के प्रति जो भावनात्मक प्रतिक्रिया वहां दिखी, वह तो हिंदी की यात्रा की ऐतिहासिक थाती बन गई।

जोहानिसबर्ग सम्मेलन का संकल्प था- युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति ऐसा भाव पैदा करना, जिससे सूचना-प्रौद्योगिकी के उपकरणों व माध्यमों, जैसे मीडिया, सोशल मीडिया, फिल्म, वाणिज्य-व्यापार तथा बाजार में हिंदी का प्रयोग बढ़े। महात्मा गांधी की सोच के अनुसार हिंदी वैश्वीकरण की दिशा में मौलिक प्रयासों पर दिया गया। केंद्रीय हिंदी संस्थान ( आगरा ) की हिंदी के प्रचार-प्रसार व प्रशिक्षण में भूमिका की सराहना करते हुए इसके कार्यों को और आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया।

पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रस्तावों के क्रम में मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना महत्वपूर्ण उपलब्धि अवश्य है, पर इसकी भूमिका व कार्यप्रणाली में स्पष्टता और पूर्ण सक्रियता के अभाव को दूर करना आवश्यक है। विदेशी छात्रों के लिए लघु हिंदी पाठ्यक्रमों, हिंदी लेखकों के प्रोत्साहन, उनकी रचनाओं के प्रकाशन, हिंदी और हिंदी विद्वानों का डाटाबेस तैयार करने, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में हिंदी भाषा संबंधी तकनीकी के विकास, विदेशियों के हिंदी प्रशिक्षण के लिए मानक पाठ्यक्रम तैयार करने, देवनागरी के लिए उपयुक्त ( फॉण्ट संबंधी समस्याओं के निराकरण सहित ) सॉफ्टवेयर विकसित करने तथा विषयगत क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलनों के आयोजन संबंधी नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन के प्रस्तावों को मूर्त रूप देना अभी शेष है।

अब तक संपन्न नौ विश्व हिंदी सम्मेलनों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्प हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में स्थापित करना रहा है। इस दिशा में भारत सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दृढ़ संकल्प सामने आया है। विदेश मंत्रालय की मंत्रालय स्तरीय हिंदी समिति में उन्होंने यह संकल्प व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के 197 सदस्यों में से दो-तिहाई का समर्थन मिलने पर सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता और उसके परिणामी लक्ष्य के रूप में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के प्रयास जारी हैं। हिंदी को विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में यद्यपि काफी व्यय आएगा, लेकिन भारत इस कार्य में कभी पीछे नहीं रहेगा। इस संकल्प के साथ आयोजित हो रहे दसवें भोपाल विश्व हिंदी सम्मेलन से हिंदी प्रेमियों को बड़ी आशाएं हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन सिर्फ एक जलसा नहीं है। यह अपनी पीठ थपथपाने का मौका भी नहीं है, इसे तो आत्मनिरीक्षण और आत्मालोचन का अवसर होना चाहिए। यह सोचने का भी कि 68 वर्षों के लोकतांत्रिक भारत में अब भी अपनी भाषा के पूर्ण मुखरित-पल्लवित होने की बाट देश क्यों जोह रहा है? हिंदी सम्मेलनों के अब तक के सभी प्रस्तावों की सूक्ष्म समीक्षा या ऑडिट आवश्यक है। इसके बाद आगे का रास्ता तय करना होगा। लेकिन यह कठिन काम करेगा कौन? सम्मेलन आयोजित करने वाले सम्मेलन के आखिरी दिन के रस्मी गुणगान और अपनी पीठ थपथपाने में लगे होंगे। लेकिन सम्मेलन की ऊर्जा से लबरेज उत्साही राष्ट्रभाषा-राजभाषा-मातृभाषा के संकल्पवान लोगों की ऊर्जा को फर्ज अदायगी की तरह अगले सम्मेलन तक के लिए मुल्तवी करने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होंगे, बल्कि अगले सम्मेलन तक की विस्तृत कार्ययोजना को मूर्त रूप देना बड़ी चुनौती होगी। यह चुनौती हिंदी प्रेमियों के सामने भी है, और हिंदी के लिए अभूतपूर्व ऊर्जा से लैस वर्तमान केंद्र सरकार के सामने भी। दोनों मिलकर चलें, तो कम से कम शत-प्रतिशत सरकारी कामकाज हिंदी में हो सकेंगे और हिंदी संपर्क भाषा के रूप में पूरे भारत में प्रतिष्ठित हो पाएगी। आशा की जानी चाहिए कि अगला विश्व हिंदी सम्मेलन इन संकल्पों के प्रति समर्पण के साथ निरंतर चलते रहने का मंत्र और इसके लिए अनंत ऊर्जा प्रदान करेगा।

लेखक - राममोहन पाठक
सदस्य, राजभाषा हिंदी समिति, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार

साभार - हिन्दुस्तान दैनिक, पेज नं. - 12 | मुरादाबाद | सोमवार22 जून 2015

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