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हिंदी वाले ही हिंदी के शत्रु बन गए - तरुण विजय

हममें एक पृष्ठ भी शुद्ध हिंदी लिखने की योग्यता नहीं होगी, फिर भी हिंदी का जुलूस निकालेंगे और तमिलनाडु से कहेंगे कि तुम हिंदी पढ़ो! अजीब अहंकार है।

तरुण विजय
मानो हम सऊदी अरब या अफ्रीका में रह रहे हों। हिंदी में कोई बड़ा नेता भाषण दे या उच्च अधिकारी फाइल पर टिप्पणी लिखे, तो खबर बन जाती है। खबर तो तब बननी चाहिए थी, जब राष्ट्रभाषा हिंदी के देश में कोई हिंदी में काम न करे या उसका विरोध करे। करीब साढ़े छह दशक के बाद भी हिंदी की दुर्दशा यह है कि शायद ही किसी पार्टी का किसी राजनीतिक दल का मूल वक्तव्य हिंदी में बनता हो। वह पहले अंग्रेजी में बनता है और फिर हिंदी में ऐसा सत्यानाशी अनुवाद होता है, जिसे पढ़कर लगता है कि इससे अच्छा था कि अनुवाद किया ही न जाता। जो पत्रकार ऐसे समाचार संस्थान में काम करते हैं, जिसमें अंग्रेजी के अखबार भी छपते हैं, तो भले ही वे हिंदी दैनिक या साप्ताहिक के पत्रकार हों, उनके परिचय पत्र अंग्रेजी में होते हैं। मामला रौब जमाने का है। हिंदी सिर्फ वोट और बाजार की भाषा है। वह भी विकृत की जा रही है। यह मजबूरी है कि हिंदी में भाषण दिए बिना वोट नहीं मिल सकते। वरना दिल्ली की पांच सितारा संस्कृति में डूब सिर्फ अंग्रेजी के विश्व में विचरण करने वाले अंग्रेजी में ही भाषण देकर वोट लेने का प्रयास करते हैं। वर्ष खत्म होने में अब चार महीने भी नहीं हैं। पिटी- पिटाई लीक के अनुसार नेताओं, अफसरों और नामी-गिरामी नागरिकों से अगर पूछा जाए कि आपने वर्ष 2015 में कौन-सी पुस्तक पढ़ी, किस लेखक ने सबसे अधिक प्रभावित किया, तो अधिकांश केवल अंग्रेजी के लेखकों और पुस्तकों के नाम बताएंगे। यह सिद्ध करने के लिए कि वे पढ़े-लिखे हैं तथा विश्वव्यापी ज्ञान से युक्त हैं। सांसद, विधायक, अफसर हों या सामान्य कामकाजी भारतीय, जहां तक प्रयास होगा, प्राण तक दांव पर लगाकर बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजता है। हिंदी पढ़-लिखकर भविष्य अच्छा होगा, ऐसा कितना लोग मानते हैं, पूछ लीजिए। बच्चों का हिंदी विद्यालयों में भेजेंगे नहीं, हिंदी की पुस्तकें पढ़ेंगे नहीं। हिंदी में सीवी यानी बायोडाटा या संक्षिप्त जीवनवृत्त किसी कंपनी को भेजने का जोखिम नहीं उठाएंगे। चार वाक्य बिना अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों के इस्तेमाल किए बोलने की क्षमता नहीं रखेंगे।

एम.ए. पीएच.डी. करेंगे, लेकिन एक पृष्ठ भी शुद्ध हिंदी लिखने की योग्यता नहीं होगी। फिर भी हिंदी का जुलूस निकालेंगे और तमिलनाडु से कहेंगे कि तुम हिंदी पढ़ो। अजीब अहंकार है।

हिंदीभाषी प्रदेशों में ही हिंदी बाजार, घर और सरकारी कार्यालयों से तिरोहित होती जा रही है। इसका कारण है कि हिंदी के माध्यम से प्रतिष्ठा और पैसा, पद और प्रोन्नति मिल सकती है, ऐसा विश्वास खत्म होता जा रहा है। किसी भी मंत्रालय अथवा कार्यालय में हिंदी में दिए गए प्रपत्र एवं अंग्रेजी में भेजे गए आवेदन पर भिन्न प्रतिक्रियाएं प्राप्त होती हैं। हिंदी अब हमारे वर्तमान और भविष्य के लिए केवल राजभाषा समितियों के औपचारिक लोकाचार एवं कभी-कभी उबाल पर आने वाले संघ लोकसेवा आयोग जैसे मुद्दों से जुड़े आंदोलनों तक सीमित होती गई है। क्या किसी ने इस बात पर प्रश्न उठाया कि अधिकांश उपभोक्ता उत्पादक टुथपेस्ट, अंग्रेजी दवाइयां, विमान के बोर्डिंग पास एवं टिकट, जूतों-चप्पलों पर छपने वाले नाम और मूल्य, कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर तथा इंटरनेट से जुड़े विषयों की जानकारी इत्यादि हिंदी अथवा भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं प्राप्त होती? क्या इन सबको खरीदने या इस्तेमाल करने वाले लोग अंग्रेज हैं अथवा वे भारतीय भाषा नहीं जानते? जानते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हिंदी में अपने उत्पादों के नाम बाजार में धमक पैदा करेंगे, ऐसा माना नहीं जाता। भारत में निर्मित होने वाली कारों तथा अन्य वाहनों के नाम यूरोपीय क्यों होते हैं? भला हो संजय गांधी का, जिन्होंने जापान की सुजुकी का मारुतिकरण किया, वरना हिंदी अथवा किसी भारतीय भाषा में वाहन अथवा महंगे उत्पाद खरीदे जाएंगे, ऐसा भरोसा उन लोगों को नहीं है, जो ऐसी वस्तुओं के कारखाने चलाते हैं।
वास्तव में हमारा भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान ही घटता जा रहा है। ऐसे अनेक परिवार मिलेंगे, जो बड़े अहंकार के साथ बताते हैं कि उनके बच्चे हिंदी, तमिल या पंजाबी नहीं बोल पाते।

स्कूल में टीचर जी ने कहा है कि सिर्फ अंग्रेजी बोलो, ताकि अभ्यास हो जाएगा। हम किसी भी भारतीय भाषा के सम्मान के प्रति गंभीर ही नहीं हैं। ऐसे कितने उत्तर या पूर्वी क्षेत्रों के विद्यालय हैं, जहां तमिल, तेलगू, कन्नड़ या असमिया भाषाओं की महान विरासत, उनके महान साहित्यकारों और कवियों का संक्षिप्त ही सही, लेकिन परिचय दिया जाना जरूरी माना जाता है? अपने-अपने बक्सों में बंद शिक्षा और राजनीति का व्यापार भाषायी संघर्ष में तो रुचि ले सकता है, लेकिन भाषायी सेतु बनाने में किसकी रुचि है?

हिंदी की यह दुर्दशा हिंदीवालों के ही अपनी भाषा के प्रति दुर्लक्ष्य का परिणाम है। वर्षों बाद भारत को सौभाग्य से ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने देश में ही नहीं, अमेरिका से लेकर चीन तक हिंदी में भाषण देकर एवं विदेशी राष्ट्रध्यक्षों से हिंदी में बात कर राष्ट्रभाषा का गौरव बढ़ाया है। क्या उनसे कुछ सीख सकेंगे?


तरुण विजय
भाजपा के राज्यसभा सदस्य
साभार :- अमर उजाला | देशकाल | पेज नं. 16 | रविवार | 6 सितम्बर, 2015

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एम.ए. पीएच.डी. करेंगे, लेकिन एक पृष्ठ भी शुद्ध हिंदी लिखने की योग्यता नहीं होगी। फिर भी हिंदी का जुलूस निकालेंगे और तमिलनाडु से कहेंगे कि तुम हिंदी पढ़ो। अजीब अहंकार है।
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हिंदी की यह दुर्दशा हिंदीवालों के ही अपनी भाषा के प्रति दुर्लक्ष्य का परिणाम है। वर्षों बाद भारत को सौभाग्य से ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसने देश में ही नहीं, अमेरिका से लेकर चीन तक हिंदी में भाषण देकर एवं विदेशी राष्ट्रध्यक्षों से हिंदी में बात कर राष्ट्रभाषा का गौरव बढ़ाया है। क्या उनसे कुछ सीख सकेंगे?

...एकदम सच्ची बात...
यही सही समय है हिंदी के प्रचार प्रसार और घर-घर की भाषा बनाने का ...
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