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निजभाषा उन्नति - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल।। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे।

निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल।।


करहु बिलम्ब न भ्रात अब उठहु मिटावहु शूल।
निज भाषा उन्नति करहु प्रथम जो सब को मूल।।


प्रचलित करहु जहान में निज भाषा करि जत्न।
राज काज दरबार में फैलावहु यह रत्न।।


सुतसो तिय सो मीत सो भृत्यन सो दिन रात।
जो भाषा मधि कीजिए निज मन की बहु बात।।


निज भाषा निज धरम निज मान करम व्यवहार।
सबै बढ़ावहु बेगि मिलि कहत पुकार-पुकार।।


पढ़ो लिखो कोउ लाख विध भाषा बहुत प्रकार।
पै जबही कछु सोचिहो निज भाषा अनुसार।।


अंग्रेजी पढ़ि के जद्यपि सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन रहत हीन के हीन।।


- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

( भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जन्म 9 सितम्बर, सन् 1850 ई. में काशी में हुआ था। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र 'गिरिधरदास' जी भी कवि थे। भारतेन्दु जी ने निबन्ध, नाटक, कविता आदि की रचना की। आधुनिक हिन्दी काल के वे जन्मदाता कहे जाते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ 'प्रेम माधुरी', 'प्रेम फुलवारी', 'भक्तमाल', 'विद्या सुन्दर', 'रत्नावली', 'मुद्राराक्षस', 'भारत जननी', 'दुर्लभ बंधु', 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'श्रीचन्द्रावली', 'भारत दुर्दशा', 'अंधेर नगरी', 'प्रेम जोगिनी', 'सुलोचना', 'परिहास वंचक', 'मदालसा', 'लीलावती' एवं 'दिल्ली दरबार दर्पण' आदि हैं। इन्होंने खड़ी बोली में गद्य लिखा और गद्य लिखने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। भारतेन्दु जी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। भारतेन्दु जी का निधन 6 जनवरी, सन् 1885 ई. को चौंतीस वर्ष चार महीने की अल्पायु में ही हो गया था। )

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