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October 2015
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अंग्रेजी ! व्यर्थ घबरातीं
तुम भारत से नहीं जा सकती
अंग्रेज चले गए
आत्मा अंग्रेजी यहीं छोड़ गए
आत्मा कभी नहीं मरती
अंग्रेजी ! तुम भारत से नहीं मिट
सकती,
हिन्दी भारत का शरीर है
और तुम आत्मा
शरीर नश्वर होता है और
आत्मा परमात्मा
भारतीय चाहें जो करें
आत्मा को नहीं मार सकते
न उसे मरने दे सकते,
हे सात समन्दर पार की परी!
तुम आयातित हो
निर्यात नहीं की जा सकती
हम हिन्दी का समुद्र में निर्यात कर देगें,
पर तुम पर आंच नहीं आने देंगे,
क्योंकि हिन्दी की उपज के ढेर लगे
पड़े हैं
और खपत रत्ती भर भी नहीं,
तुम हिन्दी दिवस पर व्यर्थ डर जातीं,
ओ मायाविनी ! तुम भारत से कभी नहीं जा सकतीं।

- चित्रलेखा अग्रवाल
चौमुखा पुल, मुरादाबाद
साभार - हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 10 | मुरादाबाद | मंगलवार | 15 सितम्बर, 2015

आधुनिक हिंदी को भी डेढ़ सौ बरस से अधिक हो गए। फिर भी हम हिंदी का वास्तविक जीवन में प्रयोग कम करते हैं, क्योंकि कमी हमारी भाषा में नहीं, हमारे अंदर है, जो हम अपनी भाषा को तवज्जो न देकर विदेशी भाषाओं की तरफ रुझान कर रहे हैं। हमें अपनी हिंदी भाषा पर ही विश्वास नहीं है। हिंदी भाषा का मतलब हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान जबान से है। जब पश्चिम के लोग हमारी भाषा में दिलचस्पी ले सकते हैं, तो क्या हम हिन्दुस्तानी होकर अपनी भाषा को बढ़ावा नहीं दे सकते? अपनी भाषा सबसे अहम है, क्योंकि उसमें हमारा मान है। हिंदी ने सबको अपनाया है, तो क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम अब उसको अपनाएं और बढ़ावा दें। डरकर अपनी भाषा को कृत्रिम न बनाएं, उसे समझें और समझाएं। जो बोली में बसता है, वह घर है। घर से दूर कौन-सा ठौर है?

~ शिवांगी सेंगर
आगरा, उत्तर प्रदेश
साभार - हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 10 | मुरादाबाद | शनिवार | 12 सितम्बर, 2015

हिंदी भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता व सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी भाषा है। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के पश्चात हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला। धीरे-धीरे यह लोकल से ग्लोबल भाषा बनकर उभर रही है। कविता, कहानी व कथा-वाचन की दुनिया से निकलकर हिंदी बाजार और रोजगार की भाषा बनी है। 21वीं सदी में हिंदी तेजी से संपर्क भाषा से बाजार, मीडिया, तकनीकी, ज्ञान-विज्ञान, विमर्श, इंटरनेट और प्रशासन की भाषा बनकर प्रकट हुई। बावजूद इसके, हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं। जाहिर है, तादाद से अधिक वर्चस्व ने महत्व पाया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रबल न होने का खामियाजा इस भाषा को भुगतान पड़ रहा है। दशकों बाद, पुन: भारत में विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है। हमें विभिन्न देशों से कूटनीति के दम पर हिंदी के लिए समर्थन हासिल करना होगा।

नंदलाल
दिल्ली विश्विद्यालय
ईमेल - nandlalsumit@gmail.com
हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 24 | मुरादाबाद संस्करण | शुक्रवार | 11 सितम्बर 2015

इसे महज इत्तेफाक कहें, या शर्म की बात कि मातृभाषा अपने ही देश में वजूद खोती नजर आ रही है। आज ऐसा माहौल बन गया है कि जो हिंदी में बोलता है या जिसे अंग्रेजी नहीं आती, उसे लोग कम पढ़ा-लिखा समझते हैं या उसका मजाक उड़ाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल भेजने की बजाय कॉन्वेंट भेजते हैं। गरीब से गरीब भी यही चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़े। कुछ लोग तो बड़े घमंड से कहते हैं कि मेरे बच्चे को हिंदी बहुत कम आती है, वह शुरू से अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा है। असल में, हिंदी को मिटाने में खुद हिंदी वाले जिम्मेदार हैं। आज वस्तु के नाम से लेकर सीवी बनाने और साक्षात्कार देने तक हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है। देखा जाए, तो हिंदी उस व्यक्ति की तरह है, जो अपने कंधे पर अंग्रेजी नाम के विकलांग को बैठाए हुए हैं, जिसे देखने में यह प्रतीत होता है कि अंग्रेजी ऊपर है और हिंदी नीचे। लेकिन असल में अंग्रेजी, हिंदी के सहारे है।

कफील अहमद फारूकी
नोएडा, उत्तर प्रदेश

हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 24 | मुरादाबाद संस्करण | शुक्रवार | 11 सितम्बर 2015

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