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हिंदी भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता व सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी भाषा है। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के पश्चात हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला। धीरे-धीरे यह लोकल से ग्लोबल भाषा बनकर उभर रही है। कविता, कहानी व कथा-वाचन की दुनिया से निकलकर हिंदी बाजार और रोजगार की भाषा बनी है। 21वीं सदी में हिंदी तेजी से संपर्क भाषा से बाजार, मीडिया, तकनीकी, ज्ञान-विज्ञान, विमर्श, इंटरनेट और प्रशासन की भाषा बनकर प्रकट हुई। बावजूद इसके, हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं।

हिंदी भारतीय राष्ट्रीय अस्मिता व सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी भाषा है। स्वाधीनता के कुछ वर्षों के पश्चात हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला। धीरे-धीरे यह लोकल से ग्लोबल भाषा बनकर उभर रही है। कविता, कहानी व कथा-वाचन की दुनिया से निकलकर हिंदी बाजार और रोजगार की भाषा बनी है। 21वीं सदी में हिंदी तेजी से संपर्क भाषा से बाजार, मीडिया, तकनीकी, ज्ञान-विज्ञान, विमर्श, इंटरनेट और प्रशासन की भाषा बनकर प्रकट हुई। बावजूद इसके, हिंदी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाओं में शामिल नहीं। जाहिर है, तादाद से अधिक वर्चस्व ने महत्व पाया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रबल न होने का खामियाजा इस भाषा को भुगतान पड़ रहा है। दशकों बाद, पुन: भारत में विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है। हमें विभिन्न देशों से कूटनीति के दम पर हिंदी के लिए समर्थन हासिल करना होगा।

नंदलाल
दिल्ली विश्विद्यालय
ईमेल - nandlalsumit@gmail.com
हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 24 | मुरादाबाद संस्करण | शुक्रवार | 11 सितम्बर 2015

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