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हिन्दी की व्यथा-कथा

हिन्दी भारत का शरीर है और तुम आत्मा शरीर नश्वर होता है और आत्मा परमात्मा भारतीय चाहें जो करें आत्मा को नहीं मार सकते न उसे मरने दे सकते, हे सात समन्दर पार की परी! तुम आयातित हो निर्यात नहीं की जा सकती हम हिन्दी का समुद्र में निर्यात कर देगें, पर तुम पर आंच नहीं आने देंगे, क्योंकि हिन्दी की उपज के ढेर लगे पड़े हैं और खपत रत्ती भर भी नहीं, तुम हिन्दी दिवस पर व्यर्थ डर जातीं, ओ मायाविनी ! तुम भारत से कभी नहीं जा सकतीं।

अंग्रेजी ! व्यर्थ घबरातीं
तुम भारत से नहीं जा सकती
अंग्रेज चले गए
आत्मा अंग्रेजी यहीं छोड़ गए
आत्मा कभी नहीं मरती
अंग्रेजी ! तुम भारत से नहीं मिट
सकती,
हिन्दी भारत का शरीर है
और तुम आत्मा
शरीर नश्वर होता है और
आत्मा परमात्मा
भारतीय चाहें जो करें
आत्मा को नहीं मार सकते
न उसे मरने दे सकते,
हे सात समन्दर पार की परी!
तुम आयातित हो
निर्यात नहीं की जा सकती
हम हिन्दी का समुद्र में निर्यात कर देगें,
पर तुम पर आंच नहीं आने देंगे,
क्योंकि हिन्दी की उपज के ढेर लगे
पड़े हैं
और खपत रत्ती भर भी नहीं,
तुम हिन्दी दिवस पर व्यर्थ डर जातीं,
ओ मायाविनी ! तुम भारत से कभी नहीं जा सकतीं।

- चित्रलेखा अग्रवाल
चौमुखा पुल, मुरादाबाद
साभार - हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 10 | मुरादाबाद | मंगलवार | 15 सितम्बर, 2015

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जय मां हाटेशवरी...
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 01/11/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...

सुन्दर और सार्थक। स्वाधीनता के बाद से हमारे देश में, हिंदी के खिलाफ षड्यंत्र रचे जाते रहे हैं। उन्ही का परिणाम है कि हिंदी आजतक अपना अनिवार्य स्थान नहीं पा सकी है। हम अपनी मानसिक गुलामी की वजह से यह मान बैठे हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम नहीं चल सकता।

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