हिन्दी साहित्य की रचनाओं का हिन्दी वेब ब्लॉग

मातृभाषा को खतरा

इसे महज इत्तेफाक कहें, या शर्म की बात कि मातृभाषा अपने ही देश में वजूद खोती नजर आ रही है। आज ऐसा माहौल बन गया है कि जो हिंदी में बोलता है या जिसे अंग्रेजी नहीं आती, उसे लोग कम पढ़ा-लिखा समझते हैं या उसका मजाक उड़ाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल भेजने की बजाय कॉन्वेंट भेजते हैं। गरीब से गरीब भी यही चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़े। कुछ लोग तो बड़े घमंड से कहते हैं कि मेरे बच्चे को हिंदी बहुत कम आती है, वह शुरू से अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा है।

इसे महज इत्तेफाक कहें, या शर्म की बात कि मातृभाषा अपने ही देश में वजूद खोती नजर आ रही है। आज ऐसा माहौल बन गया है कि जो हिंदी में बोलता है या जिसे अंग्रेजी नहीं आती, उसे लोग कम पढ़ा-लिखा समझते हैं या उसका मजाक उड़ाते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने बच्चों को हिंदी स्कूल भेजने की बजाय कॉन्वेंट भेजते हैं। गरीब से गरीब भी यही चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़े। कुछ लोग तो बड़े घमंड से कहते हैं कि मेरे बच्चे को हिंदी बहुत कम आती है, वह शुरू से अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा है। असल में, हिंदी को मिटाने में खुद हिंदी वाले जिम्मेदार हैं। आज वस्तु के नाम से लेकर सीवी बनाने और साक्षात्कार देने तक हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है। देखा जाए, तो हिंदी उस व्यक्ति की तरह है, जो अपने कंधे पर अंग्रेजी नाम के विकलांग को बैठाए हुए हैं, जिसे देखने में यह प्रतीत होता है कि अंग्रेजी ऊपर है और हिंदी नीचे। लेकिन असल में अंग्रेजी, हिंदी के सहारे है।

कफील अहमद फारूकी
नोएडा, उत्तर प्रदेश

हिन्दुस्तान दैनिक | पेज नं. 24 | मुरादाबाद संस्करण | शुक्रवार | 11 सितम्बर 2015

एक टिप्पणी भेजें

बनारसी साड़ियाँ खरीदें केवल - Laethnic.com/sarees

योगदानकर्ता

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget