आजादी के 68 वर्षों बाद भी हिंदी संवाद की नहीं, सिर्फ अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है। तमाम सांविधानिक अनुच्छेदों और उपबंधों के बावजूद हिंदी हाशिये पर ही रही है। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 343 ( 1 ) में देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी को संघ की भाषा का दर्जा दिया। पर क्या बीती अर्द्धशती में हिंदी संघ की भाषा बन सकी है? आज भी, अधिकांश काम हिंदी की बजाय अंग्रेजी में हो रहे हैं। कई सरकारी महकमों में तो अधिकारियों को हिंदी की चिंदी करने में गर्व की अनुभूति होती है। यदि आप कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोलकाता ( उत्तर-पूर्व भी शामिल ) तक देखें, तो क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव वाले इलाकों में टूटी-फूटी ही सही, पर सबको हिंदी आती है, यानी यह संवाद का माध्यम बनने में पूर्णतया समर्थ है। ऐसे में, जब तक आम आदमी की यह भाषा शासन व्यवस्था की भाषा नहीं बनेगी, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा ही रहेगा।


~ तरुण श्रीवास्तव, खुर्जा
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