बचपन में ही बॉक्सिंग डे सुन लिया था। ऐसा लगता था कि वह कोई ऑस्ट्रेलियाई चीज है। उस दिन वहां पर टेस्ट मैच शुरू होता है। वह भी मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड यानी एमसीजी पर। उस वक्त एमसीजी और बॉक्सिंग डे एक-दूसरे के पर्याय लगते थे। तब महसूस होता था कि कोई बॉक्सिंग वगैरह होती होगी उस दिन।

उस दिन का ईसाई धर्म से कोई वास्ता है, यह समझ से परे था। बाद में समझ आया कि उसका बॉक्सिंग से कोई लेना-देना नहीं है। दरअसल ये तो बॉक्स हैं। ये एक किस्म के दानपात्र हैं। वह तो क्रिसमस के अगले दिन की रस्म से जुड़ा है। यह रस्म ठीक-ठाक कब से शुरू हुई, कहना मुश्किल है। लेकिन इसे दो सदी के आसपास तो हो ही गए हैं।

हर धर्म में दान पर जोर है। हम जो भी कमाते हैं, खाते हैं, उसमें से कुछ हिस्सा जरूरतमंद तक भी पहुंचना चाहिए। यह हर समाज अपने तरीके से करता है। 'साईं इतना दीजिए, जामें कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा ना रहूं, साधु न भूखा जाय।' अगर हम ठीक-ठाक कमा खा रहे हैं, तो महज अपना ही ख्याल न करें।

अपने और अपने परिवार को देखना सचमुच जरूरी है। लेकिन उसके बाद समाज के लिए भी हमारी जिम्मेदारी बनती है। अगर उसे हम पूरा नहीं करते हैं, तो अधूरे रहते हैं। मैं, परिवार और समाज इस त्रिवेणी के बिना सब अधूरा है। समाज हमें बहुत कुछ देता है। मैं और मेरा परिवार तो लोग निभा ले जाते हैं। लेकिन समाज के मामले में अटक जाते हैं। उन्हें समाज से शिकायतें ज्यादा रहती हैं। हालांकि समाज के जरूरतमंदों को देना रस्मोरिवाज का हिस्सा नहीं होना चाहिए। लेकिन उससे भी बात बनती है, तो क्या बुरा है ? शायद इसीलिए सभी धर्मों ने उस पर अच्छा-खासा जोर दिया है। काश, बॉक्सिंग डे की भावना हमेशा हम पर राज करे।


राजीव कटारा

साभार हिन्दुस्तान दैनिक, मनसा वाचा कर्मणा | मुरादाबाद संस्करण | शनिवार, 26 दिसम्बर, 2015 | पेज संख्या - 14