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2016
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साइकिल बने अनिवार्य
देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नोटबंदी एकमात्र विकल्प नहीं है। बहुत सारे तरीके हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था में व्यापक स्तर पर सुधार लाया जा सकता है। यदि केंद्र कानून बनाकर लोगों तथा अन्य सरकारी कर्मियों के लिए यह अनिवार्य कर दे कि सप्ताह में किसी भी निर्धारित तिथि को एक से दो दिन ( खास परिस्थितियों व आवश्यक सेवाओं को छोड़कर ) साइकिल चलाना अनिवार्य है, तो अर्थव्यवस्था व सेहत में सुधार के अलावा प्रदूषण में कमी का भी एहसास हो सकता है। जब मोटर वाहनों का परिचालन कम होगा, तो पेट्रोलियम ईंधन की खपत भी कम होगी, जिससे वातावरण में विषैले रासायनिक धुएं का मिश्रण भी कम होगा।

~ नवेन्दु नवीन, मुजफ्फरपुर, बिहार
ईमेल - navin.navendu@yahoo.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

चीन को फायदा
पीओएस ( प्वॉइंट ऑफ सेल ) मशीनों की आपूर्ति चीनी कंपनियों पर निर्भर है। बैंकों ने बड़ी मात्रा में इन मशीनों को मंगाना शुरू कर दिया है। ऐसे में, जब हम डिजिटल लेन-देन की ओर बढ़ रहे हैं, तो इसका फायदा पीओएस मशीनों के माध्यम से चीनी कंपनियों को होना 'मेक इन इंडिया' को आगे बढ़ने से रोकता है। यह बात सरकार के ध्यान में न आना संभव नहीं। फिर भी चीन को चुना गया है। मित्र होने का नाटक करके दुश्मन जैसा बर्ताव करने वाले उस देश से आयात को कम करने की बजाय उसमें बढ़ोतरी के लिए कदम आगे बढ़ाए जा रहे हैं। भारतीय उत्पादकों को मौका ही नहीं मिलेगा, तो हमारी अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी?

~ अर्पिता पाठक
ईमेल - arpitabpathak@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

नकदविहीन अर्थव्यवस्था, कैशलेस अर्थव्यवस्था
आयकर अधिकारियों द्वारा विभिन्न बैंकों, निजी वित्तीय प्रतिष्ठानों और स्वर्णकारों के यहां छापे डालने से करोड़ों नए नोट, सोने की ईंटें और जन-धन खातों में जमा किया गया लाखों का काला धन मिल रहा है। इससे यह बात साबित होती है कि प्रधानमंत्री मोदी की राह आसान नहीं है। यदि बैंक और सर्राफा कारोबारी ईमानदारी से अपना काम करते, तो अब तक नकदी की समस्या खत्म हो गई होती। यदि इसी तरह छापेमारी होती रही, तो काफी मात्रा में नकदी बैंकों में आ जाएगी। वास्तव में देखा जाए, तो इलेक्ट्रॉनिक भुगतान अपनाने के बाद नकदी की जरूरत ही महसूस नहीं होती। इसलिए हमारे देश के अधिक से अधिक लोगों को कैशलेस इकोनॉमी की ओर बढ़ना चाहिए।

~ सुधीर यादव
ईमेल - sudheer.yaadav@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

इन दिनों जब हम अपने रोजमर्रा के जीवन को नए सिरे से ढालने में जुटे हैं, तो ऐसा लगता है कि हमने हाशिये पर खड़े लोगों की तरफ से अपनी आंखें मूंद ली हैं। उन गरीबों को हम बिसरा बैठे हैं, जो सुदूर देहात में रहते हैं। नोटबंदी जैसी किसी नीति को आकार देने और उसे लागू करने से पहले कोई हुकूमत आखिर कैसे उन लोगों को अनदेखा कर सकती है, जो इंटरनेट या मोबाइल फोन से दूर हैं?
कैशलेस, नकदविहीन
सरकार काला धन रखने वालों और नोटबंदी से उन पर पड़ रहे प्रभाव की बात तो कहती है, मगर यह नहीं बताती कि आखिर एक गरीब हिन्दुस्तानी कैसे इस परिस्थिति से पार पाएगा ? हमें नहीं भूलना चाहिए कि देश की 50 प्रतिशत से अधिक संपत्ति चंद धन्ना सेठों के पास है, जिनकी कुल आबादी महज एक प्रतिशत है। ऐसे में, क्या यह वाकई उचित था कि शेष 99 प्रतिशत आबादी को काला धन निकालने के नाम पर मुश्किल में डाल दिया जाए ? काला धन जमाखोरों ने तो अपने धन को सफेद करने का चोर रास्ता भी ढूंढ लिया है।

सरकार को यह समझना चाहिए कि हर नकदी लेन-देन  बुरा नहीं होता। वैसे भी, काला धन का बहुत छोटा सा हिस्सा ही नकद में है। भारत का नकदी-जीडीपी अनुपात 12 फीसदी है, जबकि 10 फीसदी से भी कम भारतीयों ने कैशलेस विकल्प का कभी, कहीं इस्तेमाल किया है। देश 'पेटीएम करो' के नारे तो लगा रहा है, पर क्या यह समझ रहा है कि ई-वॉलेट का कोई मतलब नहीं है, यदि आपके पास इंटरनेट लगा मोबाइल फोन न हो और किसी बैंक में सक्रिय खाता व डेबिट या क्रेडिट कार्ड न हो? इंटरनेट सोसायटी की भी मानें, तो इंटरनेट सुविधा वाला मोबाइल होने के बाद भी दक्षिण एशिया में ऐसी 50 फीसदी आबादी मोबाइल पर इंटरनेट का उपयोग नहीं करती।

अपने देश की हालत इससे जुदा नहीं है। हमारी आबादी लगभग सवा अरब है और क्रेडिट कार्ड 2.45 करोड़ व डेबिट कार्ड 66.18 करोड़ लोगों के पास हैं, मगर ये सभी भी नियमित रूप से इनका इस्तेमाल नहीं करते। एटीएम भी देश भर में दो लाख से कुछ ज्यादा हैं, जबकि उपनगरों और गाँवों में एटीएम की संख्या 75,000 ही है। ऐसे में, जब प्रधानमंत्री कैशलेस होने की अपील करते हैं, तो असल में वह उन्हीं लोगों को संबोधित कर रहे होते हैं, जिनके पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, जो इंटरनेट से जुड़े हैं ( करीब 40 करोड़ आबादी ) और जो सोशल मीडिया ( 12.5 करोड़ आबादी ) पर सक्रिय हैं। यानी प्रधानमंत्री देश की आधी आबादी की ही बात कर रहे हैं। गांव-देहात में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए बायोमीट्रिक आधारित पीओएस मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, मगर देश में महज 15 लाख मशीनें हैं, और उनका प्रदर्शन शायद ही संतोषजनक है।

अगर हुकूमत वाकई देश को कैशलेस बनाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले ऐसा ढांचा खड़ा करना होगा, जो कैशलेस लेन-देन में मददगार हो। इसके लिए 'डिजिटल इंडिया' को साकार करने की जरूरत है। यानी देश की पंचायतों के इंटरनेट से जुड़ने पर ही इसकी सफलता निर्भर है। मुश्किल यह है कि हम यह तक नहीं जानते कि 'डिजिटल इंडिया' किन-किन चुनौतियों से जूझ रही है? सरकार ने कहा है कि सभी लोग अपने तमाम दस्तावेज ऑनलाइन रखें। मगर गांव में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेजों को अपलोड करना इतना आसान नहीं है। उन्हें नजदीकी डिजिटल सर्विस सेंटर तक जाने के लिए भी रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसी तरह, हमने गरीब से गरीब नागरिक को भले ही आधार कार्ड दे दिया है और उसे बायोमीट्रिक मशीनों से लिंक कर दिया है, पर हम यह भूल गए हैं कि ऐसे लोगों की उंगलियों को ये मशीनें आमतौर पर इसलिए नहीं पढ़ पातीं, क्योंकि इनका श्रम ही ऐसा है कि उंगलियों में बार-बार कटने के निशान पड़ते रहते हैं।

अगर सरकार कुशलता से काम कर रही है, तो उसे पता होना चाहिए कि किसके पास काला धन है ? और अगर यह लिस्ट उसके पास है, तो फिर नोटबंदी की क्या जरूरत ? सवाल यह भी कि क्या उसने ऐसे लोगों को निशाना बनाने के लिए अन्य विकल्पों का कितना इस्तेमाल किया? फिलहाल लग यही रहा है कि बैठे-बिठाए बुलाई गई यह आपदा भारत को और गरीब बना रही है, क्योंकि इसके निशाने पर गरीब हैं।

~ ओसामा मंजर
संस्थापक-निदेशक, डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन
साभार - हिन्दुस्तान | नजरिया | मुरादाबाद | शनिवार | 17 दिसंबर 2016

'आगरा-दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली खड़ी बोली को मानक हिंदी का रूप पाने के लिए कई मोड़ों से गुजरना पड़ा है। हिंदी पखवाड़े पर विशेष टिप्पणी।'
कैलाश वाजपेयी

केंद्रीय लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा को लेकर हुए विवाद से लेकर हिंदी लगातार चर्चा में बनी हुई है। कहीं हिंदी में हो रहे अनुवाद को लेकर, तो कहीं दक्षिण भारत में हिंदी थोपने को लेकर विवाद के कारण। लेकिन जिस हिंदी को लेकर इतना विवाद हो रहा है, उसके स्वरूप और इतिहास को लेकर चर्चा बहुत कम ही होती है।

जब हम 'हिंदी' शब्द का प्रयोग करते हैं, तब हमारा तात्पर्य 'खड़ी बोली हिंदी' से ही होता है। ऐसा माना जाता है कि खड़ी बोली शब्द का प्रयोग द हिंदी स्टोरी टेलर नामक पुस्तक के लेखक 'गिलक्राइस्ट' ने किया था। मगर इसी के साथ संवत 1860 में लल्लूलाल जी ने अपनी कृति प्रेमसागर में भी हमें खड़ी बोली शब्द से परिचित कराया, जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा : 'संवत 1860 में लल्लूलाल कवि ब्राह्मण गुजराती सहस्त्र अवदीच, आगरेवाले ने विस का सार ले यामिनी भाषा छोड़ दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में कह 'प्रेमसागर' नाम धरा।' इसे भी संयोग ही कहेंगे कि इसी वर्ष पंडित सदल मिश्र ने अपनी सुविख्यात कृति नासिकेतोपाख्यान में लिखा - अब संवत 1860 में 'नासिकेतोपाख्यान' जिसमें चन्द्रावती की कथा कही है देववाणी से कोई-कोई समझ नहीं सकता इसलिए इसका लेखन खड़ी बोली में किया गया है ( राजर्षि अभिनन्दन ग्रंथ पृष्ठ - 481, लेखिका- आशा गुप्त )।

खड़ी बोली के पताका वाहक बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री को काव्य में खड़ी बोली प्रयोग करने का 'ईजान बंदा' कहा गया है। यह विशेषण उन्हें कोलकाता में मिला। 'ईजान बंदा' शब्द तृतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन में संपन्न कार्य विवरण के पृष्ठ 40 पर रेखांकित है। डॉ ग्रियर्सन ने लाल चन्द्रिका ( संवत 1866 ) की भूमिका में लिखा है कि इस प्रकार की भाषा का इससे पहले भारत में पता न था, इसलिए जब लल्लूलाल ने प्रेमसागर लिखा, तब वह एक बिल्कुल नई भाषा गढ़ रहे थे।

खड़ी बोली हिंदी पर टिप्पणी करते हुए उसने कहा था जैसी कालजयी कहानी के लेखक चंद्रधर धर्मा गुलेरी ने अपनी पुरानी हिंदी कृति में लिखा है- हिन्दुओं की रची हुई पुरानी कविता जो मिलती है वह ब्रज भाषा या पूर्वी, बैसवाड़ी, अवधी, राजस्थानी और गुजराती आदि में ही मिलती है अर्थात 'पड़ी बोली' में पाई जाती है। खड़ी बोली या पक्की बोली या वर्तमान गद्य-पद्य को देखकर जान पड़ता है कि उर्दू रचना में फारसी अरबी तत्सम् या तद्भव को निकालकर, संस्कृत या हिंदी तत्सम् या तद्भव रखने से हिंदी बना ली।

लगभग इसी तरह की प्रतिक्रिया डॉ धीरेंद्र वर्मा, शितिकंठ, चंद्रबली पांडेय, गुलाबराय, किशोरीदास वाजपेयी और पद्म सिंह शर्मा आदि द्वारा की गई टिप्पणियों में भी मिलती है। जहां तक डॉ सुनीति कुमार चटर्जी का प्रश्न है, तो उन्होंने लैंग्वेज ऐंड द लिंग्विस्टिक प्रॉब्लम नामक अपनी कृति में लिखा है कि कोर्ट-कचहरी में प्रयुक्त होने की प्रक्रिया में इसी मिश्रित किस्म की भाषा को मानक भाषा मान लिए जाने के कारण अन्य सभी भाषाओं ब्रज, अवधि आदि में प्रचुर साहित्य उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें पड़ी बोली कह दिया गया।

जब हम खड़ी बोली हिंदी पर ध्यान देते हैं, जो लिपि एवं शब्द प्राचुर्य में संस्कृत की 'दुहिता' मानी जाती है, तो पता चलता है कि प्राचीन भारत में भाषाओं के लिए 'भाषिका' शब्द प्रचलित था। भाषा के विषय में मान्यता है कि वह अपरिभाषेय है, वह क्यों बनी, इसको लेकर विद्वान यह तो मानते हैं कि मनुष्य और पशु-पक्षी एक तरह का वाक्-यंत्र लेकर पैदा होते हैं, जो गिनी-चुनी ध्वनियां बोल या कर सकता है, इससे आगे किसी के पास कोई उत्तर नहीं। अपने देश की वाणी की उत्पत्ति की सबसे पहली सूचना ऋग्वेद के दशम मंडल के 71वें सूक्त में मिलती है। वेद के रूप में फूटी वाणी का प्रचार स्वत: हुआ।

शब्द की सत्ता पर, कालांतर में मीमांसकों ने काफी गहराई से सोचा। यह विवरण मानमेयोदय नामक ग्रंथ में मिलता है। पश्चिम जिसे 'इंट्यूशन नॉलेज' कहता है, मानमेयोदय में वही प्रमाज्ञान है। प्रमा उप पदार्थ के ज्ञान को कहते हैं, जो अज्ञात होने पर भी वास्तविक हो। स्मृति, अनुवाद, संशय या भ्रम को मानमेयोदय में अप्रमा कहा गया है, इसलिए कि भ्रम नामक कोई ज्ञान होता ही नहीं। पर्वत पर धुएं का होना अनुमान ज्ञान है, भ्रम नहीं। प्रत्यक्ष का ज्ञान मानमेयोदय में शब्द का कारक माना गया है। शब्द से अर्थ कैसे निकलता है, मानमेयोदयकार ने इसे कई उदाहरण देकर समझाया है। विस्तार से हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे। विश्व के सभी भाषाविद् एक स्वर से यही दोहराते हैं- पाणिनि ने हम सबका वध कर डाला है- कैसे? आइए इसे समझें। उदाहरण के लिए 'ढाणी' शब्द को लें। यह शब्द, राजस्थानी, हरियाणवी और मध्य प्रदेश तक में बोला जाता है। शब्दों की यात्रा पर कार्य कर रहे डॉ डबास का कहना है- स्थान नामों में ढाणी एक आवास-बोधक शब्द है, जो किसी व्यक्ति, कुल, गोत्र, जाति या गांव, जिसके निकट यह ढाणी स्थित हो, उसके निवासियों के लिए यह शब्द बोला जाता है। यह शब्द कभी प्रत्यय, तो कभी उपसर्ग लगाकर बोला जाता है। जैसे ढाणी खूबीराम यानी खूबीराम नाम वाले व्यक्ति की ढाणी। डूडियों की ढाणी अर्था जाटों के डूडी नामक गोत्रवालों की ढाणी।

गहरी पड़ताल से पता चलता है कि ढाणी संस्कृत की 'धा' धातु से बना है, जो स्थापित करने, धारण करने, कसकर पकड़ने के अर्थों की द्योतक है। इसी धातु से संस्कृत में धान शब्द बनता है, जो आधान संदूक, स्थान या अधिष्ठान के अर्थ में प्रयुक्त होता है। संस्कृत के अग्निधान, हविधान, क्षुरधान आदि शब्द इसी धातु से बने हैं। मोनियर विलियम्स ने इसी धान शब्द का स्त्रीलिंग रूप धानी को माना है। जैसे अंगारधानी अर्थात उठाऊ चूल्हा या अंगीठी, गोपालधानी अर्थात प्रमुख गोप या मुखिया का आवास, यमधानी अर्थात यम का आवास या फिर राजधानी अर्थात राजा का निवासस्थान, राजमहल या फिर राजसत्ता का केंद्र। ये सारे शब्द उक्त धानी के आधार पर ही बने हैं। संस्कृत की धानी का ही रूपांतरण हिंदी में आते-आते ढाणी हो गया। धानी के पुल्लिंग रूप धान से ढाणा शब्द विकसित हुआ है। यह है हिंदी की जननी संस्कृत भाषा के वैयाकरण प्रकांड भाषाविद् पाणिनि की अष्टध्यायी का कमाल, जिसमें चार हजार सूत्र हैं और हर सूत्र में मुश्किल से तीन वाक्य।

~ कैलाश वाजपेयी
वरिष्ठ साहित्यकार

साभार : हिन्दुस्तान दैनिक | मुरादाबाद | गुरुवार | 18 सितंबर 2014 | अखबार पृष्ठ संख्या - 18 |

लगभग 33 करोड़ भारतीय, यानी उसकी करीब एक तिहाई आबादी सूखे की मार झेल रही है। भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े इलाके को सूखे ने धूल की कटोरी में तब्दील कर दिया है। यहां की फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं और किसान अपनी भूमि छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। 
भारत जल संकट India's water crisis
कोयले से संचालित बिजलीघरों को, जो कि भारत में ऊर्जा के सबसे बड़े स्त्रोत हैं, अपना उत्पादन रोकना पड़ा है, क्योंकि पास की नदी में स्टीम बनाने लायक पानी उपलब्ध नहीं है। तालाबों के किनारे बंदूकधारी गार्ड लगाने पड़ रहे हैं, ताकि हताश किसानों को पानी निकालने से रोका जा सके। दरअसल, समस्या की एक वजह अल नीनो है, जिसने वातावरण में अतिरिक्त गरमी पैदा कर दी है। लेकिन इस समस्या का बड़ा कारण बरसों से जल-संसाधनों का कुप्रबंधन है। साल 2009 में आई एक अमेरिकी रिपोर्ट ने, जिसे नेशनल एरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ( National Aeronautics and Space Administration ) ने जारी किया था, सैटेलाइट तस्वीरों के जरिये साफ-साफ दिखाया था कि उत्तर भारत में धान, गेहूं और जौ की खेती वाले इलाकों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। परिणामस्वरूप, और गहरे कुओं की खुदाई ने स्थिति को और बदतर बना दिया। भारत के जल-स्त्रोत और कुएं अब सूखने लगे हैं। वहां के कथित रेत-माफिया ने स्थानीय अधिकारियों के साथ सांठगांठ करके अनुचित तरीके से रेत निकासी का कारोबार जारी रखा। गौरतलब है कि ये रेत जल संरक्षण के लिए काफी जरूरी होते हैं, क्योंकि इनसे रिसकर ही पानी जलदायी स्तर तक पहुंचता है। भारत में अब गरमी का मौसम शुरू हो रहा है और तापमान नई-नई ऊंचाई पर पहुंचने लगा है। संतोष की बात यह है कि भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष मानसून के सामान्य से बेहतर रहने की भविष्यवाणी की है। लेकिन जब तक वहां वर्षा जल के संचयन का इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं तैयार किया जाता, तब तक इसका ज्यादा हिस्सा यूं ही बहता रहेगा या फिर उसका वाष्पीकरण हो जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी की तात्कालिक जिम्मेदारी तो सूखाग्रस्त लोगों की मदद करना है। लेकिन उन्हें अपने एजेंडे में पानी को भी अब ऊपर जगह देनी पड़ेगी।

साभार - द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका | The New York Times, America

पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित जिन 64 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया है, उनकी विस्तृत पड़ताल में वक्त लगेगा, लेकिन यह एक बड़ा कदम है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मौत एक रहस्य बनी हुई है, जिसकी बड़ी वजह यही है कि सरकार के पास इससे संबंधित जो दस्तावेज हैं, वे कभी सार्वजनिक नहीं किए गए। बताया जाता है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने जो फाइलें सार्वजनिक की हैं, उनसे यह लगता है कि अंग्रेज और अमेरिकी गुप्तचर विभागों को भी यह शक था कि नेताजी की मौत हवाई दुर्घटना में नहीं हुई है, हालांकि इस प्रसंग से पूरा परदा शायद तभी उठे, जब केंद्र सरकार के पास जो फाइलें हैं, वे सार्वजनिक हों। पश्चिम बंगाल सरकार के पास जो फाइलें हैं, वे सन् 1937 से 1947 के बीच की हैं, यानी आजादी के बाद नेताजी से संबंधित दस्तावेज केंद्र सरकार के पास हैं। उनमें ऐसे दस्तावेज भी हो सकते हैं, जो निश्चित रूप से बता सकें कि क्या नेताजी की हवाई दुर्घटना में मौत हुई थी या नहीं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस
इस रहस्य को छोड़ भी दिया जाए, तो इतने पुराने दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इससे इतिहास को समझने में मदद मिलती है। यह स्वाभाविक है कि हम अपने राष्ट्रीय नायकों का सम्मान करें, खासकर आजादी के आंदोलन के नेताओं का,  लेकिन यह भी याद रखना और इस बात पर जोर देना जरूरी है कि वे भी इंसान थे, कोई दैवी पुरुष नहीं। उनमें कई महान गुण थे, तो कई मानवोचित कमजोरियां भी। उनकी कमजोरियां या कुछ मौकों पर गलत फैसलों को छिपाने की कोई वजह नहीं है, न ही इससे उनका सम्मान घटता है। हमारे यहां एक प्रवृत्ति यह है कि किसी भी असुविधाजनक प्रसंग के बारे में जानकारी को छिपाया जाए। इससे हमें इतिहास को समझने और उससे सीखने में जो मदद मिल सकती है, वह नहीं मिलती। महात्मा गांधी और उनके संघर्ष को समझने में निर्मल कुमार बोस की किताब माई डेज विद गांधी  बहुत महत्वपूर्ण है। बोस नोआखली में गांधीजी की यात्रा के दौरान उनके साथ थे और वह किताब उन्हीं दिनों के बारे में है। बोस ने लिखा है कि उन पर इस बात का बहुत दबाव था कि इस किताब को न छपवाया जाए, क्योंकि गांधीजी के कई सहयोगी सोचते थे कि इससे गांधीजी की छवि खराब होती है। दूसरा उदाहरण सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की पराजय की पड़ताल करने वाली हेंडरसन ब्रूक रिपोर्ट का है, जिसे सार्वजनिक करने में सरकार हिचकिचाती रही। इसकी वजह से सैन्य इतिहासकारों या राजनीतिशास्त्रियों को उस दौर की सही तस्वीर देख पाने में दिक्कत हुई। भारतीय सेना को भी इस रिपोर्ट से जो समझ हासिल हो सकती थी, वह नहीं हुई। इसी तरह नेताजी से संबंधित दस्तावेजों से अगर किसी राजनेता या संस्था की छवि पर दाग लगने का डर है, तो वह बेमानी है। अफवाहों से जितना नुकसान होता है, उतना अमूमन सत्य से नहीं होता। वैसे भी नेताजी प्रसंग से जुड़े तकरीबन सभी लोगों की अब मौत हो चुकी है।

किसी भी गोपनीय सरकारी दस्तावेज को सार्वजनिक करने में एहतियात तभी जरूरी होती है कि ऐसी किसी प्रक्रिया के बारे में जानकारी सार्वजनिक न की जाए, जो अब भी जारी है और उस पर जानकारी सार्वजनिक करने से असर पड़ता हो। वैसे भी 20वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास और उसके नेताओं के बारे में हमारे समाज में जो समझ है, वह ज्यादातर अज्ञान, अर्द्धसत्यों और मिथकों पर आधारित है। ऐसे में, कुछ सत्य व वास्तविकता की खुराक हमारी समझ को बेहतर ही करेगी।

साभारहिन्दुस्तान दैनिक | हिन्दुस्तान संपादकीय | शनिवार, 19 सितम्बर, 2015 | पेज संख्या - 12

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और उनके परिवार से जुड़ी चौंसठ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। कायदे से आजादी के बाद ही सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी गोपनीय जानकारियां सार्वजनिक हो जानी चाहिए थीं। लेकिन ऐसा न करके प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने नेताजी के संदर्भ में ब्रिटिशकालीन नीति को ही कायम रखा। उनका तर्क था कि नेताजी का सच सामने आने से कई देशों से हमारे रिश्ते खराब होंगे। इसी से यह धारणा बनी कि नेहरू के नेताजी के साथ रिश्ते सहज नहीं थे, और वह उनसे जुड़ा सच नहीं बताना चाहते थे। यह इसलिए भी कहना पड़ता है कि 1945 में ताइवान में हुई वायुयान दुर्घटना में सुभाषचंद्र की मृत्यु की सूचना पर देश ने न सिर्फ पूरी तरह यकीन नहीं किया, बल्कि आजादी के दौर के वह इकलौते व्यक्तित्व थे, जिनके वेश बदलकर लौटने के बारे में अनेकानेक कहानियां समय-समय पर सामने आईं, जिनकी सत्यता भी हालांकि कभी प्रमाणित नहीं हो पाई। नेताजी का सच जानने के लिए जो तीन प्रयास हुए, उनमें से मुखर्जी आयोग का निष्कर्ष था कि उनकी मौत 1945 में विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा है कि इन फाइलों को पढ़ने से ऐसा लगता है कि सुभाषचंद्र बोस 1945 के बाद भी जीवित थे ! आजादी के बाद लंबे समय तक नेताजी के कोलकाता स्थित आवास पर उनके परिजनों की जासूसी होती थी, इन फाइलों के सार्वजनिक होने से इसकी भी पुष्टि हुई है। चूंकि स्वतंत्रता के बाद केंद्र में कांग्रेस ही ज्यादातर सत्ता में रही, इसलिए नेताजी के प्रति उन सरकारों का रवैया समझ में आता है। पर अब केंद्र में चूंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है, ऐसे में लाजिमी है कि वह नेताजी से जुड़ी सौ से भी अधिक गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करे। यह इसलिए भी जरूरी है कि उन फाइलों के जरिये नेताजी के जीवन से जुड़े सच के और करीब पहुंचा जा सकता है। सुभाषचंद्र बोस से जुड़े सच को सिर्फ इसलिए छिपाए रखने का औचित्य नहीं है कि इससे किसी दूसरे देश के साथ हमारे रिश्ते खराब होंगे और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का सच सामने आएगा।


साभार अमर उजाला संपादकीय | प्रवाह | मुरादाबाद | शनिवार | 19 सितम्बर, 2015

बादशाह अकबर के जमाने में 'दुल्ला भट्टी' नाम का एक मशहूर डाकू था। वह अमीरों को लूटता था और जरूरतमंदों की मदद करता था। अकबर के सैनिक इसे पकड़ने में असफल रहे क्योंकि लोग उसे छिपा लेते थे। एक बार वह एक गरीब परिवार की 'सुन्दर मुंदरिये' नामक लड़की की शादी में भाई बन कर आया। अपने साथ ढेरों शादी के साजो सामान, चन्नियां, कपड़े जेवरात भी लाया। सौ मन शक्कर भी लाया। इधर मुगल सैनिकों को उसके बारे में पता लगा गया था लड़की की विदाई के बाद मुगल सेना के सिपाहियों ने डाकू दुल्ला भट्टी को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर से जमकर लड़ाई हुई और अंत में दुल्ला भट्टी मारा। तभी से ये घटना प्रेम और भाईचारे का प्रतीक बन गई कि दुल्ले ने अपनी बहन की शादी में जान तक दे दी। इस प्रसंग के उपलक्ष्य में ही लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है।


माना जाता है मनुष्य व्यवहार के साथ भाषा हर क्षण बदलती है, क्योंकि यही बदलाव उसके जीवित होने का सबूत है। हिंदी भी दिनोंदिन बदल रही है, और बढ़ रही है। 2001 में ही देश की 42.2 करोड़ आबादी हिंदी बोल रही थी, जिसमें 2011 की जनगणना में इजाफा हुआ ही होगा। इसी तरह वैश्विक परिदृश्य में हिंदी सीखने वाले लोगों की संख्या भी पिछले आठ वर्षों में करीब 50 फीसदी बढ़ी है। आकलन यह भी है कि दुनिया की शीर्ष तीन भाषाओं में हिंदी शामिल है ! इन तमाम तस्वीरों के बाद भी इन दिनों हिंदी भाषाप्रेमी इस लोकप्रिय भाषा के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। आखिर क्यों? दरअसल, विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली ( सीबीसीएस ) ने अंतर-स्नातक में हिंदी को वैकल्पिक विषय बना दिया है। 


अब तक उत्तर भारत के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनिवार्य विषय होने के कारण छात्रों के लिए इसे पढ़ना जरूरी था। मगर अब इसे पढ़ना 'मजबूरी' नहीं। आशंका यह है कि वैकल्पिक विषय होने के कारण अंग्रेजी या अन्य आधुनिक भाषाओं के प्रति ही छात्र ज्यादा आकर्षित होंगे। यह ठीक है कि बाजार में हिंदी का झंडा बुलंद है। साबून-शैंपू सहित मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी जैसे महंगे उत्पादों के विज्ञापन भी हिंदी में आने लगे हैं। बाहर हिंदी की पैठ और गहरी हुई है। लेकिन देश के भीतर एक भाषा के रूप में हिंदी मजबूत हुई है, यह नहीं कह सकते। ठेठ हिंदी प्रदेश के रूप में पहचाने जाने वाले उत्तर प्रदेश में आज भी स्कूली छात्र बड़ी संख्या में हिंदी में फेल होते हैं। रचनात्मकता के मोर्चे पर हिंदी पहले जैसी ऊर्वर है, यह जोर देकर नहीं कह सकते। ऐसे समय में हिंदी को वैकल्पिक विषय बनाना एक बड़ा खतरा उठाना है। दूसरी भाषाएं सीखना कितना भी जरूरी क्यों न हो, लेकिन हम अपनी भाषा को भगवान भरोसे नहीं छोड़ सकते। लिहाजा सवाल यह नहीं है कि अभी देश में अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा ले रहे करीब दो करोड़ बच्चे भविष्य में हिंदी के प्रति कितना समर्पित होंगे। समझना यह भी है कि हिंदी की बुनियाद किस तरह मजबूत हो। विश्वविद्यालयों में हिंदी का आकर्षण बढ़ेगा, पर इसे अधिक से अधिक पठनीय तो बनाएं। इसकी गुणवत्ता तो सुधारें। क्या हुमें इसकी चिंता नहीं होनी चाहिए?

लेखक - हेमेन्द्र मिश्र


साभार - अमर उजाला, प्रसंगवश, पेज नं. 10, लखनऊ संस्करण । शनिवार । 20 जून 2015

हिंदी को लेकर अमूमन दो तरह की बातें होती हैं। एक तो यह है कि अंग्रेजी के दबाव में हिंदी का क्षरण हो रहा है। स्कूलों में शुरू से ही अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती है, जिससे बच्चे हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं सीख पा रहे हैं। हिंदी बोलना हीनता का लक्षण माना जाता है और हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जे का व्यवहार मिलता है। दूसरा पक्ष यह है कि हिंदी का विस्तार हो रहा है। मनोरंजन और सूचना माध्यमों में हिंदी की ताकत बढ़ती दिख रही है। हिंदी टीवी चैनल सारे देश में, बल्कि कुछ अन्य देशों में भी छाये हुए हैं। विज्ञापन हिंदी में बनाए जा रहे हैं। हिंदी सिनेमा का बाजार अंतरराष्ट्रीय हो चला है। बड़े-बड़े अंग्रेजीदां हिंदी बोलने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ये दोनों परस्पर विरोधी बातें दिखती हैं, लेकिन विचित्र बात यह है कि दोनों ही में सच्चाई है। इस समारोह के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिंदी की ताकत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आने वाले वक्त में डिजिटल दुनिया में केवल तीन भाषाएं - अंग्रेजी, हिंदी और चीनी छाई रहेंगी। उन्होंने दूरसंचार और सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योगों को हिंदी भाषा के बाजार का विस्तार करने की सलाह दी।
एक और बात प्रधानमंत्री ने जो कही, वह भी काफी महत्वपूर्ण है कि बहुत सारी भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं, उनकी सुध लेना भी बहुत जरूरी है। जिन भाषाओं के सिकुड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है, उन्हें संरक्षित और संवर्द्धित करने की भी जरूरत है। हिंदी के संदर्भ में यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि व्यापक रूप से प्रचलित हिंदी की जड़ें अनेक बोलियों और भाषाओं में हैं। हिंदी भाषी समाज और विद्वानों की यह कोशिश होनी चाहिए कि हिंदी की इन जड़ों को हर तरह से सुरक्षित रखा जाए। हिंदी के प्रचार के उत्साह में ऐसा नहीं होना चाहिए कि हिंदी स्थानीय बोलियों और भाषाओं को खत्म करने का जरिया बन जाए, बल्कि हिंदी को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विभिन्नताओं को सुरक्षित रखने का साधन बनना होगा। हिंदी वास्तविक रूप से किसी एक प्रदेश या क्षेत्र की भाषा नहीं है, वह भारत में संपर्क भाषा की तरह विकसित हुई है और उसने अनेक भाषाओं से शब्द और मुहावरे लिए हैं। जगह-जगह की हिंदी में स्थानीय असर और लहजे से एक अलग तरह का रंग आ जाता है और यही विविधता हिंदी की सबसे बड़ी ताकत है। अंग्रेजी का इन स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों से कोई जैविक संबंध नहीं है, इसलिए वह उन्हें संजोने में मददगार नहीं हो सकती, लेकिन हिंदी हो सकती है। संपर्क भाषा होने की वजह से वह भारत की तमाम भाषाओं के बीच संवाद का माध्यम भी बनी हुई है। हिंदीभाषी लोगों को अपनी भाषा की इस महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस बात का भी जिक्र किया है।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मातृभाषा गुजराती है, लेकिन अगर वह देश भर में लोकप्रिय और स्वीकार्य नेता बने, तो इसमें उनके हिंदी ज्ञान और हिंदी में आकर्षक ढंग से और अधिकारपूर्ण भाषण देने का भी बड़ा योगदान है। भारत में कोई नेता हिंदी जाने बिना राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना सकता। नरेंद्र मोदी के मुताबिक, उन्होंने हिंदी रेलगाड़ियों में चाय बेचते हुए सीखी। उन्हीं की तरह देश के करोड़ों ऐसे लोगों ने जिंदगी के तमाम क्षेत्रों में हिंदी सीखी है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है। इस मायने में सारे देश को जोड़ने और राष्ट्रव्यापी संवाद करने की भाषा सिर्फ हिंदी ही हो सकती है। नरेंद्र मोदी ने जिस रास्ते से हिंदी को सीखा और अपनाया पूरा देश उसी रास्ते से इसे सीखता और अपनाता रहा है।

साभार हिन्दुस्तान दैनिक संपादकीय | 11 सितम्बर, 2015 |

प्रिय पाठकगणों,

आप सभी को यह बताते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि हिन्दी चिट्ठा 8 जनवरी से 14 जनवरी, 2016 तक 'विश्व हिन्दी दिवस सप्ताह सम्मेलन-2016' आयोजित कर रहा है। इस आयोजन में हम हिन्दी भाषा के विकास, प्रचार-प्रसार और भविष्य आदि जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर 'हिन्दी चिट्ठा' पर चर्चा करेंगे। हम इस सप्ताह हिन्दी भाषा के कई बेहतरीन तथ्यपरक महत्वपूर्ण और पठनीय आलेख भी प्रकाशित करेंगे। इसी उपलक्ष्य में हमारा सभी पाठकगणों तथा ब्लॉगर/चिट्ठाकारों मित्रों से सविनय निवेदन है कि आप इस साप्ताहिक सम्मेलन में भाग लें और हमें अपनी सुविचारों से अवगत कराएँ। 

हमें पूरी आशा है कि आप सभी पाठकगणों और ब्लॉगर मित्रों को ये विषयवार साप्ताहिक सम्मलेन प्रस्तुति अत्यंत पसंद आएगी।

सादर ... अभिनन्दन।।
हर्षवर्धन श्रीवास्तव 

गोपालदास 'नीरज'
कोई नहीं पराया, मेरा घर सारा संसार है।
मैं न बँधा हूँ देश काल की जंग लगी जंजीर में,
मैं न खड़ा हूँ जाति - पाँति की ऊँची - नीची भीड़ में।
मेरा धर्म न कुछ स्याही - शब्दों का सिर्फ गुलाम है,
मैं बस कहता हूँ कि प्यार है घट - घट में राम है।
मुझसे तुम न कहो मन्दिर - मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ
मेरा तो आराध्य आदमी देवालय हर द्वार है। 
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है। 
कहीं रहे कैसे भी मुझको प्यारा यह इंसान है,
मुझको अपनी मानवता पर बहुत - बहुत अभिमान है। 
अरे नहीं देवत्व, मुझे तो भाता है मनुजत्व ही,
और छोड़ कर प्यार नहीं स्वीकार सकल अमरत्व भी। 
मुझे सुनाओ तुम न स्वर्ग - सुख की सुकमार कहानियाँ,
मेरी धरती, सौ - सौ स्वर्गों से ज्यादा सुकुमार है। 
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है। 
मैं सिखलाता हूँ कि जियो और जीने दो संसार को,
जितना ज्यादा बाँट सको तुम बाँटो अपने प्यार को। 
हँसों इस तरह, हँसे तुम्हारे साथ दलित यह धूल भी। 
चलो इस तरह कुचल न जाय पग से कोई शूल भी। 
सुख न तुम्हारा सुख केवल, जग का भी उसमें भाग है,
फूल डाल का पीछे, पहले उपवन का श्रृंगार है। 
कोई नहीं पराया, मेरा घर सारा संसार है। 

- गोपालदास 'नीरज'

कवि गोपालदास 'नीरज' का जन्म 4 जनवरी, सन् 1925 ई. को इटावा के पास उत्तर प्रदेश में हुआ था। कवि नीरज की प्रमुख कृतियाँ हैं - संघर्ष, विभावरी, दर्द दिया है, बादल बरस गयो, आसावरी, नदी किनारे, कारवां गुजर गया, लहर पुकारे, तुम्हारे लिए आदि। कवि नीरज ने कई हिन्दी फिल्मों के लिए गाने लिखे, जिनमें शर्मीली, मेरा नाम जोकर, प्रेम पुजारी आदि प्रमुख हैं। कवि नीरज को लगातार सन् 1970, 1971 और 1972 में लगातार तीनों साल फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। गोपालदास 'नीरज' सन् 1991 ई. में पद्मश्री, सन् 1994 ई. में यश भारती सम्मान और वर्ष 2007 में भारत का तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' प्राप्त हुआ। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अध्यक्ष हैं। )

नए साल में सबसे पहले मैं चाहूंगा कि हर व्यक्ति अपने आप को बदलने का संकल्प ले। यहीं से समाज और देश में परिवर्तन शुरू होगा। वास्तव में हमें नववर्ष में खुद को और अपने समाज को नए सिरे से देखना चाहिए। आज सब कुछ हम टेलीविजन पर देखते हैं और फिर उसे बंद कर देते हैं। देश का हर व्यक्ति प्रतिदिन केवल पांच मिनट के लिए ईश्वर को और इस मिट्टी को धन्यवाद दे। हर उस शहीद को याद करे, जिसने हमें गौरवपूर्ण ढंग से आजाद रहने का यह अवसर दिलाया है। तब आप अपने और देश के अंदर बदलाव कर सकेंगे। अगर आप अपने आप को ही नहीं बदल सके, तो भला देश को क्या बदलेंगे? ईमानदारी की उम्मीद सिर्फ सरकार से न करें। स्वयं से शुरुआत करें। अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो ईमानदारी मात्र सरकार से ही अपेक्षित रहेगी और समाज में कभी दिखाई नहीं देगी।
मनोज बाजपेयी
सरकार में अंतत: वही लोग जा रहे हैं, जो इस समाज के हैं। हम वही आदमी चुनते हैं, जो हमारा प्रतिनिधित्व करता है। सोचिए कि वह प्रतिनिधित्व किस बात का करता है? आपकी इच्छाओं और सपनों के साथ वह आपके चरित्र का भी प्रतिनिधित्व करता है ! फिर हम कहते हैं कि ईमानदार को खोज पाना मुश्किल है। हमसे ही समाज बनता है और हम ही ईमानदार नहीं हैं। अब नई सोच, नए संकल्प के साथ बदलाव की शुरुआत करें। बेहतर भविष्य के लिए बच्चों में नैतिकता और संस्कार डालें। संस्कार पूजा-पाठ का नहीं होता, संस्कार सोच का होता है।

जैसे, स्वच्छता का संस्कार देखें। सरकार स्वच्छता अभियान चलाती है। वह हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दे, तो भी कुछ नहीं होगा, अगर हम व्यक्ति और समाज के तौर पर अपने आप में बदलाव नहीं लाएंगे। क्या हमने यह जिम्मेदारी ली है कि घर के कचरे को बाहर खुले में नहीं फेंकेंगे? चलती गाड़ियों से सड़कों को गंदा नहीं करेंगे? ये छोटी-छोटी बातें हैं। बाहरी बदलाव के लिए आंतरिक बदलाव पहले जरूरी है। जब हम अंदर से ईमानदार होंगे, तब हमारी सरकार भी ईमानदार होगी और हमारी वाजिब मांगें पूरी करती रहेगी।

आज के अत्याधुनिक समाज को नए साल में कुछ संकल्प भी लेने चाहिए। टेलीविजन और सोशल मीडिया की दुनिया से बाहर निकल कर हम सबको एक-दूसरे से संपर्क बनाने के प्रयास करने चाहिए। नहीं तो हम सिर्फ सूचना की क्रांति ही कर रहे हैं। अनुभव में हम पिछड़ते जा रहे हैं। आपके पास हजारों सूचनाएं हो सकती हैं। लेकिन अगर आपके पास जीवन का अनुभव नहीं होगा, तो आप केवल ट्विटर के बादशाह बने रहेंगे। जीवन के बादशाह कभी नहीं हो पाएंगे। जीवन को जानने-समझने के लिए, उसको जीना पड़ेगा, लोगों से मेल-मिलाप बढ़ाना पड़ेगा। तभी आप इंसान और इंसानी फितरत को समझ पाएंगे। वर्ना गूगल पर सर्च कीजिए, यू-ट्यूब देखिए और फेसबुक पर सब कुछ लगाते रहिए कि हमारे पास तो यह सूचना है !

ऐसा नहीं है कि मैं इन सबसे दूर हूं। सोशल मीडिया मेरे लिए क्रांति है और मैं उसका उपयोग करता हूं। वह मेरा उपयोग नहीं करता। खास तौर पर आज के युवा को यह सोचना चाहिए कि क्या वह समाज को कोई वक्त दे पा रहा है? क्या वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर चाय पीता है? क्या वह साइकिल की सवारी करते हुए बाजार के चक्कर काटता है? उसे सोशल मीडिया से निकलना पड़ेगा। लोग जब सोशल मीडिया से बाहर निकलना शुरू करेंगे, तो अपने आप को समझेंगे और एक-दूसरे को भी समझेंगे। तभी वे कोई बदलाव ला पाएंगे। मैं चाहता हूं कि युवा वर्ग समाज में सामने आए, भागीदारी करे। अपने घर की जिम्मेदारी में भागीदारी करे।

सिनेमा की बात करूं, तो मुझे ऐसा लगता है कि दर्शक बदलेगा, तो सिनेमा बदलेगा। आज छोटी-छोटी महत्वपूर्ण फिल्में हर भाषा में बन रही हैं और दर्शक उन्हें देख रहे हैं। एक अभिनेता के रूप में मेरी यही इच्छा रही है कि व्यावसायिक फिल्मों के साथ हमारा सह-अस्तित्व हो। मैं नहीं चाहता कि कॉमर्शियल फिल्में न बनें। हर तरह की फिल्में बनें। मैं दर्शकों से और मीडिया से हमेशा मांग करता रहा हूं कि आप प्रतिभा को बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से जोड़कर देखना बंद करें। एक व्यक्ति कितना पैसा कमाता है, अगर इससे उसकी प्रतिभा मापी जाने लगे, तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और दूसरों की मदद कर रहा है, क्या उसका कोई महत्व नहीं होगा? एक व्यक्ति चुनाव करता है कि मैं इंजीनियर नहीं बनूंगा और कोई एनजीओ बनाकर जरूरतमंदों की मदद करूंगा, तो क्या आप कहेंगे कि उसमें प्रतिभा नहीं है ! मेरा हमेशा इस बात से तार्किक विरोध रहा है कि किसी अच्छी फिल्म को इसलिए नकार दिया जाए कि उसने बिजनेस नहीं किया।

एक और बात मैं अंत में कहना चाहता हूं। फिल्मों से सेंसरशिप हटा देनी चाहिए। इस काट-छांट को मैं समझ नहीं पाता हूं। हमें इसकी जरूरत नहीं है। हमारे समाज में सबसे बड़ा सेंसर माता-पिता और गुरुजन हैं। आपने कभी किसी माता-पिता को देखा है कि वह अपने बच्चे को उसके देखने योग्य न होने वाली फिल्मों को देखने देता है? माता-पिता और गुरुजनों की देखरेख में बनने और विकसित होने वाले समाज और सिनेमा में किसी तरह की सेंसरशिप के मायने नहीं हैं।

मनोज बाजपेयी

चर्चित अभिनेता


साभार - अमर उजाला, मुरादाबाद संस्करण | पेज संख्या - 10 | शुक्रवार | 1 जनवरी 2016 |

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