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हिंदी का विस्तार

हिंदी इस देश की व्यापक संपर्क भाषा है, इसे देश की तमाम भाषाओं और बोलियों को सहेजने का माध्यम भी बनना चाहिए।

हिंदी को लेकर अमूमन दो तरह की बातें होती हैं। एक तो यह है कि अंग्रेजी के दबाव में हिंदी का क्षरण हो रहा है। स्कूलों में शुरू से ही अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती है, जिससे बच्चे हिंदी लिखना-पढ़ना नहीं सीख पा रहे हैं। हिंदी बोलना हीनता का लक्षण माना जाता है और हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जे का व्यवहार मिलता है। दूसरा पक्ष यह है कि हिंदी का विस्तार हो रहा है। मनोरंजन और सूचना माध्यमों में हिंदी की ताकत बढ़ती दिख रही है। हिंदी टीवी चैनल सारे देश में, बल्कि कुछ अन्य देशों में भी छाये हुए हैं। विज्ञापन हिंदी में बनाए जा रहे हैं। हिंदी सिनेमा का बाजार अंतरराष्ट्रीय हो चला है। बड़े-बड़े अंग्रेजीदां हिंदी बोलने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ये दोनों परस्पर विरोधी बातें दिखती हैं, लेकिन विचित्र बात यह है कि दोनों ही में सच्चाई है। इस समारोह के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिंदी की ताकत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आने वाले वक्त में डिजिटल दुनिया में केवल तीन भाषाएं - अंग्रेजी, हिंदी और चीनी छाई रहेंगी। उन्होंने दूरसंचार और सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योगों को हिंदी भाषा के बाजार का विस्तार करने की सलाह दी।
एक और बात प्रधानमंत्री ने जो कही, वह भी काफी महत्वपूर्ण है कि बहुत सारी भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं, उनकी सुध लेना भी बहुत जरूरी है। जिन भाषाओं के सिकुड़ने का सिलसिला शुरू हो गया है, उन्हें संरक्षित और संवर्द्धित करने की भी जरूरत है। हिंदी के संदर्भ में यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि व्यापक रूप से प्रचलित हिंदी की जड़ें अनेक बोलियों और भाषाओं में हैं। हिंदी भाषी समाज और विद्वानों की यह कोशिश होनी चाहिए कि हिंदी की इन जड़ों को हर तरह से सुरक्षित रखा जाए। हिंदी के प्रचार के उत्साह में ऐसा नहीं होना चाहिए कि हिंदी स्थानीय बोलियों और भाषाओं को खत्म करने का जरिया बन जाए, बल्कि हिंदी को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विभिन्नताओं को सुरक्षित रखने का साधन बनना होगा। हिंदी वास्तविक रूप से किसी एक प्रदेश या क्षेत्र की भाषा नहीं है, वह भारत में संपर्क भाषा की तरह विकसित हुई है और उसने अनेक भाषाओं से शब्द और मुहावरे लिए हैं। जगह-जगह की हिंदी में स्थानीय असर और लहजे से एक अलग तरह का रंग आ जाता है और यही विविधता हिंदी की सबसे बड़ी ताकत है। अंग्रेजी का इन स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों से कोई जैविक संबंध नहीं है, इसलिए वह उन्हें संजोने में मददगार नहीं हो सकती, लेकिन हिंदी हो सकती है। संपर्क भाषा होने की वजह से वह भारत की तमाम भाषाओं के बीच संवाद का माध्यम भी बनी हुई है। हिंदीभाषी लोगों को अपनी भाषा की इस महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने इस बात का भी जिक्र किया है।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मातृभाषा गुजराती है, लेकिन अगर वह देश भर में लोकप्रिय और स्वीकार्य नेता बने, तो इसमें उनके हिंदी ज्ञान और हिंदी में आकर्षक ढंग से और अधिकारपूर्ण भाषण देने का भी बड़ा योगदान है। भारत में कोई नेता हिंदी जाने बिना राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना सकता। नरेंद्र मोदी के मुताबिक, उन्होंने हिंदी रेलगाड़ियों में चाय बेचते हुए सीखी। उन्हीं की तरह देश के करोड़ों ऐसे लोगों ने जिंदगी के तमाम क्षेत्रों में हिंदी सीखी है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है। इस मायने में सारे देश को जोड़ने और राष्ट्रव्यापी संवाद करने की भाषा सिर्फ हिंदी ही हो सकती है। नरेंद्र मोदी ने जिस रास्ते से हिंदी को सीखा और अपनाया पूरा देश उसी रास्ते से इसे सीखता और अपनाता रहा है।

साभार हिन्दुस्तान दैनिक संपादकीय | 11 सितम्बर, 2015 |

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