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खुद बदलेंगे तो देश बदलेगा - मनोज बाजपेयी

नए साल में सबसे पहले मैं चाहूंगा कि हर व्यक्ति अपने आप को बदलने का संकल्प ले। यहीं से समाज और देश में परिवर्तन शुरू होगा। वास्तव में हमें नववर्ष में खुद को और अपने समाज को नए सिरे से देखना चाहिए। आज सब कुछ हम टेलीविजन पर देखते हैं और फिर उसे बंद कर देते हैं। देश का हर व्यक्ति प्रतिदिन केवल पांच मिनट के लिए ईश्वर को और इस मिट्टी को धन्यवाद दे। हर उस शहीद को याद करे, जिसने हमें गौरवपूर्ण ढंग से आजाद रहने का यह अवसर दिलाया है। तब आप अपने और देश के अंदर बदलाव कर सकेंगे। अगर आप अपने आप को ही नहीं बदल सके, तो भला देश को क्या बदलेंगे? ईमानदारी की उम्मीद सिर्फ सरकार से न करें। स्वयं से शुरुआत करें। अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो ईमानदारी मात्र सरकार से ही अपेक्षित रहेगी और समाज में कभी दिखाई नहीं देगी।

नए साल में सबसे पहले मैं चाहूंगा कि हर व्यक्ति अपने आप को बदलने का संकल्प ले। यहीं से समाज और देश में परिवर्तन शुरू होगा। वास्तव में हमें नववर्ष में खुद को और अपने समाज को नए सिरे से देखना चाहिए। आज सब कुछ हम टेलीविजन पर देखते हैं और फिर उसे बंद कर देते हैं। देश का हर व्यक्ति प्रतिदिन केवल पांच मिनट के लिए ईश्वर को और इस मिट्टी को धन्यवाद दे। हर उस शहीद को याद करे, जिसने हमें गौरवपूर्ण ढंग से आजाद रहने का यह अवसर दिलाया है। तब आप अपने और देश के अंदर बदलाव कर सकेंगे। अगर आप अपने आप को ही नहीं बदल सके, तो भला देश को क्या बदलेंगे? ईमानदारी की उम्मीद सिर्फ सरकार से न करें। स्वयं से शुरुआत करें। अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो ईमानदारी मात्र सरकार से ही अपेक्षित रहेगी और समाज में कभी दिखाई नहीं देगी।
मनोज बाजपेयी
सरकार में अंतत: वही लोग जा रहे हैं, जो इस समाज के हैं। हम वही आदमी चुनते हैं, जो हमारा प्रतिनिधित्व करता है। सोचिए कि वह प्रतिनिधित्व किस बात का करता है? आपकी इच्छाओं और सपनों के साथ वह आपके चरित्र का भी प्रतिनिधित्व करता है ! फिर हम कहते हैं कि ईमानदार को खोज पाना मुश्किल है। हमसे ही समाज बनता है और हम ही ईमानदार नहीं हैं। अब नई सोच, नए संकल्प के साथ बदलाव की शुरुआत करें। बेहतर भविष्य के लिए बच्चों में नैतिकता और संस्कार डालें। संस्कार पूजा-पाठ का नहीं होता, संस्कार सोच का होता है।

जैसे, स्वच्छता का संस्कार देखें। सरकार स्वच्छता अभियान चलाती है। वह हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दे, तो भी कुछ नहीं होगा, अगर हम व्यक्ति और समाज के तौर पर अपने आप में बदलाव नहीं लाएंगे। क्या हमने यह जिम्मेदारी ली है कि घर के कचरे को बाहर खुले में नहीं फेंकेंगे? चलती गाड़ियों से सड़कों को गंदा नहीं करेंगे? ये छोटी-छोटी बातें हैं। बाहरी बदलाव के लिए आंतरिक बदलाव पहले जरूरी है। जब हम अंदर से ईमानदार होंगे, तब हमारी सरकार भी ईमानदार होगी और हमारी वाजिब मांगें पूरी करती रहेगी।

आज के अत्याधुनिक समाज को नए साल में कुछ संकल्प भी लेने चाहिए। टेलीविजन और सोशल मीडिया की दुनिया से बाहर निकल कर हम सबको एक-दूसरे से संपर्क बनाने के प्रयास करने चाहिए। नहीं तो हम सिर्फ सूचना की क्रांति ही कर रहे हैं। अनुभव में हम पिछड़ते जा रहे हैं। आपके पास हजारों सूचनाएं हो सकती हैं। लेकिन अगर आपके पास जीवन का अनुभव नहीं होगा, तो आप केवल ट्विटर के बादशाह बने रहेंगे। जीवन के बादशाह कभी नहीं हो पाएंगे। जीवन को जानने-समझने के लिए, उसको जीना पड़ेगा, लोगों से मेल-मिलाप बढ़ाना पड़ेगा। तभी आप इंसान और इंसानी फितरत को समझ पाएंगे। वर्ना गूगल पर सर्च कीजिए, यू-ट्यूब देखिए और फेसबुक पर सब कुछ लगाते रहिए कि हमारे पास तो यह सूचना है !

ऐसा नहीं है कि मैं इन सबसे दूर हूं। सोशल मीडिया मेरे लिए क्रांति है और मैं उसका उपयोग करता हूं। वह मेरा उपयोग नहीं करता। खास तौर पर आज के युवा को यह सोचना चाहिए कि क्या वह समाज को कोई वक्त दे पा रहा है? क्या वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर चाय पीता है? क्या वह साइकिल की सवारी करते हुए बाजार के चक्कर काटता है? उसे सोशल मीडिया से निकलना पड़ेगा। लोग जब सोशल मीडिया से बाहर निकलना शुरू करेंगे, तो अपने आप को समझेंगे और एक-दूसरे को भी समझेंगे। तभी वे कोई बदलाव ला पाएंगे। मैं चाहता हूं कि युवा वर्ग समाज में सामने आए, भागीदारी करे। अपने घर की जिम्मेदारी में भागीदारी करे।

सिनेमा की बात करूं, तो मुझे ऐसा लगता है कि दर्शक बदलेगा, तो सिनेमा बदलेगा। आज छोटी-छोटी महत्वपूर्ण फिल्में हर भाषा में बन रही हैं और दर्शक उन्हें देख रहे हैं। एक अभिनेता के रूप में मेरी यही इच्छा रही है कि व्यावसायिक फिल्मों के साथ हमारा सह-अस्तित्व हो। मैं नहीं चाहता कि कॉमर्शियल फिल्में न बनें। हर तरह की फिल्में बनें। मैं दर्शकों से और मीडिया से हमेशा मांग करता रहा हूं कि आप प्रतिभा को बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से जोड़कर देखना बंद करें। एक व्यक्ति कितना पैसा कमाता है, अगर इससे उसकी प्रतिभा मापी जाने लगे, तो जो व्यक्ति ज्ञानी है और दूसरों की मदद कर रहा है, क्या उसका कोई महत्व नहीं होगा? एक व्यक्ति चुनाव करता है कि मैं इंजीनियर नहीं बनूंगा और कोई एनजीओ बनाकर जरूरतमंदों की मदद करूंगा, तो क्या आप कहेंगे कि उसमें प्रतिभा नहीं है ! मेरा हमेशा इस बात से तार्किक विरोध रहा है कि किसी अच्छी फिल्म को इसलिए नकार दिया जाए कि उसने बिजनेस नहीं किया।

एक और बात मैं अंत में कहना चाहता हूं। फिल्मों से सेंसरशिप हटा देनी चाहिए। इस काट-छांट को मैं समझ नहीं पाता हूं। हमें इसकी जरूरत नहीं है। हमारे समाज में सबसे बड़ा सेंसर माता-पिता और गुरुजन हैं। आपने कभी किसी माता-पिता को देखा है कि वह अपने बच्चे को उसके देखने योग्य न होने वाली फिल्मों को देखने देता है? माता-पिता और गुरुजनों की देखरेख में बनने और विकसित होने वाले समाज और सिनेमा में किसी तरह की सेंसरशिप के मायने नहीं हैं।

मनोज बाजपेयी

चर्चित अभिनेता


साभार - अमर उजाला, मुरादाबाद संस्करण | पेज संख्या - 10 | शुक्रवार | 1 जनवरी 2016 |

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bahut sahi baaten kahi hain Manoj ji ne....main sahmat hun...jab tak ham nahin badlenge tab tak kitne bhi paise lagaa len ..koi yojna safal nahin ho skati...

यह पोस्ट आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और कमलेश्वर में शामिल है। सादर।।

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