लगभग 33 करोड़ भारतीय, यानी उसकी करीब एक तिहाई आबादी सूखे की मार झेल रही है। भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े इलाके को सूखे ने धूल की कटोरी में तब्दील कर दिया है। यहां की फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं और किसान अपनी भूमि छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। 
भारत जल संकट India's water crisis
कोयले से संचालित बिजलीघरों को, जो कि भारत में ऊर्जा के सबसे बड़े स्त्रोत हैं, अपना उत्पादन रोकना पड़ा है, क्योंकि पास की नदी में स्टीम बनाने लायक पानी उपलब्ध नहीं है। तालाबों के किनारे बंदूकधारी गार्ड लगाने पड़ रहे हैं, ताकि हताश किसानों को पानी निकालने से रोका जा सके। दरअसल, समस्या की एक वजह अल नीनो है, जिसने वातावरण में अतिरिक्त गरमी पैदा कर दी है। लेकिन इस समस्या का बड़ा कारण बरसों से जल-संसाधनों का कुप्रबंधन है। साल 2009 में आई एक अमेरिकी रिपोर्ट ने, जिसे नेशनल एरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन ( National Aeronautics and Space Administration ) ने जारी किया था, सैटेलाइट तस्वीरों के जरिये साफ-साफ दिखाया था कि उत्तर भारत में धान, गेहूं और जौ की खेती वाले इलाकों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। परिणामस्वरूप, और गहरे कुओं की खुदाई ने स्थिति को और बदतर बना दिया। भारत के जल-स्त्रोत और कुएं अब सूखने लगे हैं। वहां के कथित रेत-माफिया ने स्थानीय अधिकारियों के साथ सांठगांठ करके अनुचित तरीके से रेत निकासी का कारोबार जारी रखा। गौरतलब है कि ये रेत जल संरक्षण के लिए काफी जरूरी होते हैं, क्योंकि इनसे रिसकर ही पानी जलदायी स्तर तक पहुंचता है। भारत में अब गरमी का मौसम शुरू हो रहा है और तापमान नई-नई ऊंचाई पर पहुंचने लगा है। संतोष की बात यह है कि भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष मानसून के सामान्य से बेहतर रहने की भविष्यवाणी की है। लेकिन जब तक वहां वर्षा जल के संचयन का इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं तैयार किया जाता, तब तक इसका ज्यादा हिस्सा यूं ही बहता रहेगा या फिर उसका वाष्पीकरण हो जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी की तात्कालिक जिम्मेदारी तो सूखाग्रस्त लोगों की मदद करना है। लेकिन उन्हें अपने एजेंडे में पानी को भी अब ऊपर जगह देनी पड़ेगी।

साभार - द न्यूयॉर्क टाइम्स, अमेरिका | The New York Times, America