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December 2016
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साइकिल बने अनिवार्य
देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नोटबंदी एकमात्र विकल्प नहीं है। बहुत सारे तरीके हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था में व्यापक स्तर पर सुधार लाया जा सकता है। यदि केंद्र कानून बनाकर लोगों तथा अन्य सरकारी कर्मियों के लिए यह अनिवार्य कर दे कि सप्ताह में किसी भी निर्धारित तिथि को एक से दो दिन ( खास परिस्थितियों व आवश्यक सेवाओं को छोड़कर ) साइकिल चलाना अनिवार्य है, तो अर्थव्यवस्था व सेहत में सुधार के अलावा प्रदूषण में कमी का भी एहसास हो सकता है। जब मोटर वाहनों का परिचालन कम होगा, तो पेट्रोलियम ईंधन की खपत भी कम होगी, जिससे वातावरण में विषैले रासायनिक धुएं का मिश्रण भी कम होगा।

~ नवेन्दु नवीन, मुजफ्फरपुर, बिहार
ईमेल - navin.navendu@yahoo.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

चीन को फायदा
पीओएस ( प्वॉइंट ऑफ सेल ) मशीनों की आपूर्ति चीनी कंपनियों पर निर्भर है। बैंकों ने बड़ी मात्रा में इन मशीनों को मंगाना शुरू कर दिया है। ऐसे में, जब हम डिजिटल लेन-देन की ओर बढ़ रहे हैं, तो इसका फायदा पीओएस मशीनों के माध्यम से चीनी कंपनियों को होना 'मेक इन इंडिया' को आगे बढ़ने से रोकता है। यह बात सरकार के ध्यान में न आना संभव नहीं। फिर भी चीन को चुना गया है। मित्र होने का नाटक करके दुश्मन जैसा बर्ताव करने वाले उस देश से आयात को कम करने की बजाय उसमें बढ़ोतरी के लिए कदम आगे बढ़ाए जा रहे हैं। भारतीय उत्पादकों को मौका ही नहीं मिलेगा, तो हमारी अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी?

~ अर्पिता पाठक
ईमेल - arpitabpathak@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

नकदविहीन अर्थव्यवस्था, कैशलेस अर्थव्यवस्था
आयकर अधिकारियों द्वारा विभिन्न बैंकों, निजी वित्तीय प्रतिष्ठानों और स्वर्णकारों के यहां छापे डालने से करोड़ों नए नोट, सोने की ईंटें और जन-धन खातों में जमा किया गया लाखों का काला धन मिल रहा है। इससे यह बात साबित होती है कि प्रधानमंत्री मोदी की राह आसान नहीं है। यदि बैंक और सर्राफा कारोबारी ईमानदारी से अपना काम करते, तो अब तक नकदी की समस्या खत्म हो गई होती। यदि इसी तरह छापेमारी होती रही, तो काफी मात्रा में नकदी बैंकों में आ जाएगी। वास्तव में देखा जाए, तो इलेक्ट्रॉनिक भुगतान अपनाने के बाद नकदी की जरूरत ही महसूस नहीं होती। इसलिए हमारे देश के अधिक से अधिक लोगों को कैशलेस इकोनॉमी की ओर बढ़ना चाहिए।

~ सुधीर यादव
ईमेल - sudheer.yaadav@gmail.com
साभार - हिन्दुस्तान | मेल बॉक्स | मुरादाबाद | शनिवार 17 दिसंबर 2016 । पेज संख्या - 12

इन दिनों जब हम अपने रोजमर्रा के जीवन को नए सिरे से ढालने में जुटे हैं, तो ऐसा लगता है कि हमने हाशिये पर खड़े लोगों की तरफ से अपनी आंखें मूंद ली हैं। उन गरीबों को हम बिसरा बैठे हैं, जो सुदूर देहात में रहते हैं। नोटबंदी जैसी किसी नीति को आकार देने और उसे लागू करने से पहले कोई हुकूमत आखिर कैसे उन लोगों को अनदेखा कर सकती है, जो इंटरनेट या मोबाइल फोन से दूर हैं?
कैशलेस, नकदविहीन
सरकार काला धन रखने वालों और नोटबंदी से उन पर पड़ रहे प्रभाव की बात तो कहती है, मगर यह नहीं बताती कि आखिर एक गरीब हिन्दुस्तानी कैसे इस परिस्थिति से पार पाएगा ? हमें नहीं भूलना चाहिए कि देश की 50 प्रतिशत से अधिक संपत्ति चंद धन्ना सेठों के पास है, जिनकी कुल आबादी महज एक प्रतिशत है। ऐसे में, क्या यह वाकई उचित था कि शेष 99 प्रतिशत आबादी को काला धन निकालने के नाम पर मुश्किल में डाल दिया जाए ? काला धन जमाखोरों ने तो अपने धन को सफेद करने का चोर रास्ता भी ढूंढ लिया है।

सरकार को यह समझना चाहिए कि हर नकदी लेन-देन  बुरा नहीं होता। वैसे भी, काला धन का बहुत छोटा सा हिस्सा ही नकद में है। भारत का नकदी-जीडीपी अनुपात 12 फीसदी है, जबकि 10 फीसदी से भी कम भारतीयों ने कैशलेस विकल्प का कभी, कहीं इस्तेमाल किया है। देश 'पेटीएम करो' के नारे तो लगा रहा है, पर क्या यह समझ रहा है कि ई-वॉलेट का कोई मतलब नहीं है, यदि आपके पास इंटरनेट लगा मोबाइल फोन न हो और किसी बैंक में सक्रिय खाता व डेबिट या क्रेडिट कार्ड न हो? इंटरनेट सोसायटी की भी मानें, तो इंटरनेट सुविधा वाला मोबाइल होने के बाद भी दक्षिण एशिया में ऐसी 50 फीसदी आबादी मोबाइल पर इंटरनेट का उपयोग नहीं करती।

अपने देश की हालत इससे जुदा नहीं है। हमारी आबादी लगभग सवा अरब है और क्रेडिट कार्ड 2.45 करोड़ व डेबिट कार्ड 66.18 करोड़ लोगों के पास हैं, मगर ये सभी भी नियमित रूप से इनका इस्तेमाल नहीं करते। एटीएम भी देश भर में दो लाख से कुछ ज्यादा हैं, जबकि उपनगरों और गाँवों में एटीएम की संख्या 75,000 ही है। ऐसे में, जब प्रधानमंत्री कैशलेस होने की अपील करते हैं, तो असल में वह उन्हीं लोगों को संबोधित कर रहे होते हैं, जिनके पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, जो इंटरनेट से जुड़े हैं ( करीब 40 करोड़ आबादी ) और जो सोशल मीडिया ( 12.5 करोड़ आबादी ) पर सक्रिय हैं। यानी प्रधानमंत्री देश की आधी आबादी की ही बात कर रहे हैं। गांव-देहात में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए बायोमीट्रिक आधारित पीओएस मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, मगर देश में महज 15 लाख मशीनें हैं, और उनका प्रदर्शन शायद ही संतोषजनक है।

अगर हुकूमत वाकई देश को कैशलेस बनाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले ऐसा ढांचा खड़ा करना होगा, जो कैशलेस लेन-देन में मददगार हो। इसके लिए 'डिजिटल इंडिया' को साकार करने की जरूरत है। यानी देश की पंचायतों के इंटरनेट से जुड़ने पर ही इसकी सफलता निर्भर है। मुश्किल यह है कि हम यह तक नहीं जानते कि 'डिजिटल इंडिया' किन-किन चुनौतियों से जूझ रही है? सरकार ने कहा है कि सभी लोग अपने तमाम दस्तावेज ऑनलाइन रखें। मगर गांव में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेजों को अपलोड करना इतना आसान नहीं है। उन्हें नजदीकी डिजिटल सर्विस सेंटर तक जाने के लिए भी रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसी तरह, हमने गरीब से गरीब नागरिक को भले ही आधार कार्ड दे दिया है और उसे बायोमीट्रिक मशीनों से लिंक कर दिया है, पर हम यह भूल गए हैं कि ऐसे लोगों की उंगलियों को ये मशीनें आमतौर पर इसलिए नहीं पढ़ पातीं, क्योंकि इनका श्रम ही ऐसा है कि उंगलियों में बार-बार कटने के निशान पड़ते रहते हैं।

अगर सरकार कुशलता से काम कर रही है, तो उसे पता होना चाहिए कि किसके पास काला धन है ? और अगर यह लिस्ट उसके पास है, तो फिर नोटबंदी की क्या जरूरत ? सवाल यह भी कि क्या उसने ऐसे लोगों को निशाना बनाने के लिए अन्य विकल्पों का कितना इस्तेमाल किया? फिलहाल लग यही रहा है कि बैठे-बिठाए बुलाई गई यह आपदा भारत को और गरीब बना रही है, क्योंकि इसके निशाने पर गरीब हैं।

~ ओसामा मंजर
संस्थापक-निदेशक, डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन
साभार - हिन्दुस्तान | नजरिया | मुरादाबाद | शनिवार | 17 दिसंबर 2016

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