समर्पित योद्धा कवि का अवसान - डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी (पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी की पुण्यतिथि पर विशेष)

कवि और स्वतन्त्रता सेनानी पण्डित माखनलाल चतुर्वेदी देश और महात्मा गाँधी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे। यह भी संयोग ही है कि 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से विख्यात कवि का देहान्त भी 30 जनवरी 1968 को उसी वक़्त हुआ, जो गाँधी जी के देहान्त का वक़्त था। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप यहाँ प्रस्तुत है उनके भांजे डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी का संस्मरण

कवि और स्वतन्त्रता सेनानी पंडित माखनलाल चतुर्वेदी देश और महात्मा गाँधी के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे। यह भी संयोग ही है कि 'एक भारतीय आत्मा' के नाम से विख्यात कवि का देहान्त भी 30 जनवरी 1968 को उसी वक़्त हुआ, जो गाँधी जी के देहान्त का वक़्त था। उनको श्रद्धांजलि स्वरूप यहाँ प्रस्तुत है उनके भांजे डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी जी का संस्मरण

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पंडित माखनलाल चतुर्वेदी
वर्ष 1967 के अंतिम तीन माह दादाजी जिला मुख्य चिकित्सालय खंडवा में भरती रहे। एक दिन सूचना मिली कि रामधारी सिंह दिनकर किसी व्याख्यानमाला में पड़ोसी कस्बे बुरहानपुर आ रहे हैं। सौभाग्य से मैं उस दिन दादाजी के समीप ही था। उन्होंने आयोजकों के समक्ष इस शर्त पर कार्यक्रम में अपने आने की पुष्टि कर दी कि उन्हें कार्यक्रम प्रारम्भ होने के पूर्व माखनलाल जी से अवश्य मिलवा दिया जाय। धवल श्वेत लंबा कुरता-पायजामा एवं दुशाला कंधे पर डाले गोधूलि बेला में दिनकर जी चिकित्सालय पहुंचे। आते ही उन्होंने दादाजी के समक्ष नमन कर कहा, 'दादा मैं दिनकर। आपकी अस्वस्थता से बड़ा चिंतित था। अब आप कैसे हैं ?' उन्होंने सिविल सर्जन और परिजनों से दादा के स्वास्थ्य की विस्तृत जानकारी ली और दादा के निकट ही कुर्सी डालकर चर्चा करते रहे। हालांकि दादाजी स्पष्ट बोल नहीं पा रहे थे, पर उनके हाव-भाव से प्रतीत हुआ कि वे काफी चैतन्य व जीवन्त अनुभव कर रहे हैं। दादा के चेहरे पर असीम उत्साह व स्फूर्ति के भावों को शब्दों में पिरो पाना मेरे लिए मुश्किल है। दिनकर जी लगभग दो घंटे दादाजी के पास रहे। उन्होंने दादाजी को कतिपय स्वरचित काव्यांश भी सुनाए, जिनमें विनोबा भावे के भूदान यज्ञ से जुड़ा यह टुकड़ा भी था -

ज़मीन दो, ज़मीन दो, ज़मीन दो, ज़मीन चाहिए। समाज के समत्व के लिए, स्वदेश के लिए, स्वराज्य के महत्व के लिए, मनुष्यता के मान के लिए, ज़मीन चाहिए कि एक दुखी किसान के लिए ज़मीन चाहिए।

दिनकर जी जैसे ही उठने को हुए, तो दादाजी के कमज़ोर हाथों ने उन्हें जोर से पकड़ लिया। शायद वे उन्हें और रोकना चाह रहे थे, पर समय की कमी और अपनी व्यस्तता बताकर दिनकर जी भरे मन से उठ खड़े हुए। दादाजी ने भी नम आंखों से उन्हें हाथ जोड़कर विदाई दी।

68 की जनवरी के अंतिम दिनों में उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया। उनका बोलना बंद हो गया था। घर के सभी सदस्य उनके आसपास रहते थे। 3-4 दिनों में वे कुछ संभले और इशारों से उन्होंने कुछ खाने की इच्छा व्यक्त की। मेरी बहनों, अरुणा व सुधा, ने छोटे-छोटे टुकड़े काटकर सेब और चीकू उन्हें दिए। 29 की शाम और अगले दिन 30 जनवरी को भी यही क्रम चला। ताजे फलों से उनमें शक्ति का संचार हुआ और इशारे से उन्होंने बैठने की इच्छा जताई। दोनों बहनों के सिर पर वे दुलार से हाथ फेरते रहे। इसी बीच कमरे में लगी गाँधी जी की तस्वीर की ओर देखकर श्रद्धा से हाथ जोड़ कुछ बुदबुदाए। उनके नेत्र मानों श्रद्धावनत कुछ कह रहे थे। उन्होंने इशारे से फल मांगे। बहनों ने उन्हें चम्मच से कुछ ही टुकड़े दिए। यकायक उन्हें जोर का ठसका आया और वे बेचैन हो मेरी बहन की गोद में लुढ़क गए। बारम्बार हिलाने पर भी वे कुछ नहीं बोले और आँखें पथरा गई थीं। गोधूलि बेला में ठीक गाँधी जी के ही निर्वाण क्षणों में यानी शाम 5:30 बजे ही दादाजी परब्रह्म में लीन हो गए। अपने समूचे जीवन के साथ मृत्यु में भी उन्होंने गाँधीजी से तादात्म्य पा लिया।

- डॉ. रवींद्र चतुर्वेदी

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