कल की बोली आज की भाषा - कैलाश वाजपेयी ( हिन्दी दिवस पर विशेष )

आगरा-दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली खड़ी बोली को मानक हिंदी का रूप पाने के लिए कई मोड़ों से गुजरना पड़ा है। हिंदी पखवाड़े पर विशेष टिप्पणी।

'आगरा-दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली खड़ी बोली को मानक हिंदी का रूप पाने के लिए कई मोड़ों से गुजरना पड़ा है। हिंदी पखवाड़े पर विशेष टिप्पणी।'
कैलाश वाजपेयी

केंद्रीय लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा को लेकर हुए विवाद से लेकर हिंदी लगातार चर्चा में बनी हुई है। कहीं हिंदी में हो रहे अनुवाद को लेकर, तो कहीं दक्षिण भारत में हिंदी थोपने को लेकर विवाद के कारण। लेकिन जिस हिंदी को लेकर इतना विवाद हो रहा है, उसके स्वरूप और इतिहास को लेकर चर्चा बहुत कम ही होती है।

जब हम 'हिंदी' शब्द का प्रयोग करते हैं, तब हमारा तात्पर्य 'खड़ी बोली हिंदी' से ही होता है। ऐसा माना जाता है कि खड़ी बोली शब्द का प्रयोग द हिंदी स्टोरी टेलर नामक पुस्तक के लेखक 'गिलक्राइस्ट' ने किया था। मगर इसी के साथ संवत 1860 में लल्लूलाल जी ने अपनी कृति प्रेमसागर में भी हमें खड़ी बोली शब्द से परिचित कराया, जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा : 'संवत 1860 में लल्लूलाल कवि ब्राह्मण गुजराती सहस्त्र अवदीच, आगरेवाले ने विस का सार ले यामिनी भाषा छोड़ दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में कह 'प्रेमसागर' नाम धरा।' इसे भी संयोग ही कहेंगे कि इसी वर्ष पंडित सदल मिश्र ने अपनी सुविख्यात कृति नासिकेतोपाख्यान में लिखा - अब संवत 1860 में 'नासिकेतोपाख्यान' जिसमें चन्द्रावती की कथा कही है देववाणी से कोई-कोई समझ नहीं सकता इसलिए इसका लेखन खड़ी बोली में किया गया है ( राजर्षि अभिनन्दन ग्रंथ पृष्ठ - 481, लेखिका- आशा गुप्त )।

खड़ी बोली के पताका वाहक बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री को काव्य में खड़ी बोली प्रयोग करने का 'ईजान बंदा' कहा गया है। यह विशेषण उन्हें कोलकाता में मिला। 'ईजान बंदा' शब्द तृतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन में संपन्न कार्य विवरण के पृष्ठ 40 पर रेखांकित है। डॉ ग्रियर्सन ने लाल चन्द्रिका ( संवत 1866 ) की भूमिका में लिखा है कि इस प्रकार की भाषा का इससे पहले भारत में पता न था, इसलिए जब लल्लूलाल ने प्रेमसागर लिखा, तब वह एक बिल्कुल नई भाषा गढ़ रहे थे।

खड़ी बोली हिंदी पर टिप्पणी करते हुए उसने कहा था जैसी कालजयी कहानी के लेखक चंद्रधर धर्मा गुलेरी ने अपनी पुरानी हिंदी कृति में लिखा है- हिन्दुओं की रची हुई पुरानी कविता जो मिलती है वह ब्रज भाषा या पूर्वी, बैसवाड़ी, अवधी, राजस्थानी और गुजराती आदि में ही मिलती है अर्थात 'पड़ी बोली' में पाई जाती है। खड़ी बोली या पक्की बोली या वर्तमान गद्य-पद्य को देखकर जान पड़ता है कि उर्दू रचना में फारसी अरबी तत्सम् या तद्भव को निकालकर, संस्कृत या हिंदी तत्सम् या तद्भव रखने से हिंदी बना ली।

लगभग इसी तरह की प्रतिक्रिया डॉ धीरेंद्र वर्मा, शितिकंठ, चंद्रबली पांडेय, गुलाबराय, किशोरीदास वाजपेयी और पद्म सिंह शर्मा आदि द्वारा की गई टिप्पणियों में भी मिलती है। जहां तक डॉ सुनीति कुमार चटर्जी का प्रश्न है, तो उन्होंने लैंग्वेज ऐंड द लिंग्विस्टिक प्रॉब्लम नामक अपनी कृति में लिखा है कि कोर्ट-कचहरी में प्रयुक्त होने की प्रक्रिया में इसी मिश्रित किस्म की भाषा को मानक भाषा मान लिए जाने के कारण अन्य सभी भाषाओं ब्रज, अवधि आदि में प्रचुर साहित्य उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें पड़ी बोली कह दिया गया।

जब हम खड़ी बोली हिंदी पर ध्यान देते हैं, जो लिपि एवं शब्द प्राचुर्य में संस्कृत की 'दुहिता' मानी जाती है, तो पता चलता है कि प्राचीन भारत में भाषाओं के लिए 'भाषिका' शब्द प्रचलित था। भाषा के विषय में मान्यता है कि वह अपरिभाषेय है, वह क्यों बनी, इसको लेकर विद्वान यह तो मानते हैं कि मनुष्य और पशु-पक्षी एक तरह का वाक्-यंत्र लेकर पैदा होते हैं, जो गिनी-चुनी ध्वनियां बोल या कर सकता है, इससे आगे किसी के पास कोई उत्तर नहीं। अपने देश की वाणी की उत्पत्ति की सबसे पहली सूचना ऋग्वेद के दशम मंडल के 71वें सूक्त में मिलती है। वेद के रूप में फूटी वाणी का प्रचार स्वत: हुआ।

शब्द की सत्ता पर, कालांतर में मीमांसकों ने काफी गहराई से सोचा। यह विवरण मानमेयोदय नामक ग्रंथ में मिलता है। पश्चिम जिसे 'इंट्यूशन नॉलेज' कहता है, मानमेयोदय में वही प्रमाज्ञान है। प्रमा उप पदार्थ के ज्ञान को कहते हैं, जो अज्ञात होने पर भी वास्तविक हो। स्मृति, अनुवाद, संशय या भ्रम को मानमेयोदय में अप्रमा कहा गया है, इसलिए कि भ्रम नामक कोई ज्ञान होता ही नहीं। पर्वत पर धुएं का होना अनुमान ज्ञान है, भ्रम नहीं। प्रत्यक्ष का ज्ञान मानमेयोदय में शब्द का कारक माना गया है। शब्द से अर्थ कैसे निकलता है, मानमेयोदयकार ने इसे कई उदाहरण देकर समझाया है। विस्तार से हम उनकी चर्चा नहीं कर रहे। विश्व के सभी भाषाविद् एक स्वर से यही दोहराते हैं- पाणिनि ने हम सबका वध कर डाला है- कैसे? आइए इसे समझें। उदाहरण के लिए 'ढाणी' शब्द को लें। यह शब्द, राजस्थानी, हरियाणवी और मध्य प्रदेश तक में बोला जाता है। शब्दों की यात्रा पर कार्य कर रहे डॉ डबास का कहना है- स्थान नामों में ढाणी एक आवास-बोधक शब्द है, जो किसी व्यक्ति, कुल, गोत्र, जाति या गांव, जिसके निकट यह ढाणी स्थित हो, उसके निवासियों के लिए यह शब्द बोला जाता है। यह शब्द कभी प्रत्यय, तो कभी उपसर्ग लगाकर बोला जाता है। जैसे ढाणी खूबीराम यानी खूबीराम नाम वाले व्यक्ति की ढाणी। डूडियों की ढाणी अर्था जाटों के डूडी नामक गोत्रवालों की ढाणी।

गहरी पड़ताल से पता चलता है कि ढाणी संस्कृत की 'धा' धातु से बना है, जो स्थापित करने, धारण करने, कसकर पकड़ने के अर्थों की द्योतक है। इसी धातु से संस्कृत में धान शब्द बनता है, जो आधान संदूक, स्थान या अधिष्ठान के अर्थ में प्रयुक्त होता है। संस्कृत के अग्निधान, हविधान, क्षुरधान आदि शब्द इसी धातु से बने हैं। मोनियर विलियम्स ने इसी धान शब्द का स्त्रीलिंग रूप धानी को माना है। जैसे अंगारधानी अर्थात उठाऊ चूल्हा या अंगीठी, गोपालधानी अर्थात प्रमुख गोप या मुखिया का आवास, यमधानी अर्थात यम का आवास या फिर राजधानी अर्थात राजा का निवासस्थान, राजमहल या फिर राजसत्ता का केंद्र। ये सारे शब्द उक्त धानी के आधार पर ही बने हैं। संस्कृत की धानी का ही रूपांतरण हिंदी में आते-आते ढाणी हो गया। धानी के पुल्लिंग रूप धान से ढाणा शब्द विकसित हुआ है। यह है हिंदी की जननी संस्कृत भाषा के वैयाकरण प्रकांड भाषाविद् पाणिनि की अष्टध्यायी का कमाल, जिसमें चार हजार सूत्र हैं और हर सूत्र में मुश्किल से तीन वाक्य।

~ कैलाश वाजपेयी
वरिष्ठ साहित्यकार

साभार : हिन्दुस्तान दैनिक | मुरादाबाद | गुरुवार | 18 सितंबर 2014 | अखबार पृष्ठ संख्या - 18 |

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