हाशिये के लोगों को जोड़े बिना कैशलेस मुमकिन नहीं

ई-वॉलेट का कोई अर्थ नहीं है, अगर आपके पास इंटरनेट युक्त मोबाइल, सक्रिय खाता व डेबिट या क्रेडिट कार्ड न हो? हम यह तक नहीं जानते कि 'डिजिटल इंडिया' किन-किन चुनौतियों से जूझ रही है, फिर कैशलेस सिस्टम कैसे बनाएंगे?

इन दिनों जब हम अपने रोजमर्रा के जीवन को नए सिरे से ढालने में जुटे हैं, तो ऐसा लगता है कि हमने हाशिये पर खड़े लोगों की तरफ से अपनी आंखें मूंद ली हैं। उन गरीबों को हम बिसरा बैठे हैं, जो सुदूर देहात में रहते हैं। नोटबंदी जैसी किसी नीति को आकार देने और उसे लागू करने से पहले कोई हुकूमत आखिर कैसे उन लोगों को अनदेखा कर सकती है, जो इंटरनेट या मोबाइल फोन से दूर हैं?
कैशलेस, नकदविहीन
सरकार काला धन रखने वालों और नोटबंदी से उन पर पड़ रहे प्रभाव की बात तो कहती है, मगर यह नहीं बताती कि आखिर एक गरीब हिन्दुस्तानी कैसे इस परिस्थिति से पार पाएगा ? हमें नहीं भूलना चाहिए कि देश की 50 प्रतिशत से अधिक संपत्ति चंद धन्ना सेठों के पास है, जिनकी कुल आबादी महज एक प्रतिशत है। ऐसे में, क्या यह वाकई उचित था कि शेष 99 प्रतिशत आबादी को काला धन निकालने के नाम पर मुश्किल में डाल दिया जाए ? काला धन जमाखोरों ने तो अपने धन को सफेद करने का चोर रास्ता भी ढूंढ लिया है।

सरकार को यह समझना चाहिए कि हर नकदी लेन-देन  बुरा नहीं होता। वैसे भी, काला धन का बहुत छोटा सा हिस्सा ही नकद में है। भारत का नकदी-जीडीपी अनुपात 12 फीसदी है, जबकि 10 फीसदी से भी कम भारतीयों ने कैशलेस विकल्प का कभी, कहीं इस्तेमाल किया है। देश 'पेटीएम करो' के नारे तो लगा रहा है, पर क्या यह समझ रहा है कि ई-वॉलेट का कोई मतलब नहीं है, यदि आपके पास इंटरनेट लगा मोबाइल फोन न हो और किसी बैंक में सक्रिय खाता व डेबिट या क्रेडिट कार्ड न हो? इंटरनेट सोसायटी की भी मानें, तो इंटरनेट सुविधा वाला मोबाइल होने के बाद भी दक्षिण एशिया में ऐसी 50 फीसदी आबादी मोबाइल पर इंटरनेट का उपयोग नहीं करती।

अपने देश की हालत इससे जुदा नहीं है। हमारी आबादी लगभग सवा अरब है और क्रेडिट कार्ड 2.45 करोड़ व डेबिट कार्ड 66.18 करोड़ लोगों के पास हैं, मगर ये सभी भी नियमित रूप से इनका इस्तेमाल नहीं करते। एटीएम भी देश भर में दो लाख से कुछ ज्यादा हैं, जबकि उपनगरों और गाँवों में एटीएम की संख्या 75,000 ही है। ऐसे में, जब प्रधानमंत्री कैशलेस होने की अपील करते हैं, तो असल में वह उन्हीं लोगों को संबोधित कर रहे होते हैं, जिनके पास क्रेडिट या डेबिट कार्ड है, जो इंटरनेट से जुड़े हैं ( करीब 40 करोड़ आबादी ) और जो सोशल मीडिया ( 12.5 करोड़ आबादी ) पर सक्रिय हैं। यानी प्रधानमंत्री देश की आधी आबादी की ही बात कर रहे हैं। गांव-देहात में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए बायोमीट्रिक आधारित पीओएस मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, मगर देश में महज 15 लाख मशीनें हैं, और उनका प्रदर्शन शायद ही संतोषजनक है।

अगर हुकूमत वाकई देश को कैशलेस बनाना चाहती है, तो उसे सबसे पहले ऐसा ढांचा खड़ा करना होगा, जो कैशलेस लेन-देन में मददगार हो। इसके लिए 'डिजिटल इंडिया' को साकार करने की जरूरत है। यानी देश की पंचायतों के इंटरनेट से जुड़ने पर ही इसकी सफलता निर्भर है। मुश्किल यह है कि हम यह तक नहीं जानते कि 'डिजिटल इंडिया' किन-किन चुनौतियों से जूझ रही है? सरकार ने कहा है कि सभी लोग अपने तमाम दस्तावेज ऑनलाइन रखें। मगर गांव में रहने वाले लोगों के लिए दस्तावेजों को अपलोड करना इतना आसान नहीं है। उन्हें नजदीकी डिजिटल सर्विस सेंटर तक जाने के लिए भी रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसी तरह, हमने गरीब से गरीब नागरिक को भले ही आधार कार्ड दे दिया है और उसे बायोमीट्रिक मशीनों से लिंक कर दिया है, पर हम यह भूल गए हैं कि ऐसे लोगों की उंगलियों को ये मशीनें आमतौर पर इसलिए नहीं पढ़ पातीं, क्योंकि इनका श्रम ही ऐसा है कि उंगलियों में बार-बार कटने के निशान पड़ते रहते हैं।

अगर सरकार कुशलता से काम कर रही है, तो उसे पता होना चाहिए कि किसके पास काला धन है ? और अगर यह लिस्ट उसके पास है, तो फिर नोटबंदी की क्या जरूरत ? सवाल यह भी कि क्या उसने ऐसे लोगों को निशाना बनाने के लिए अन्य विकल्पों का कितना इस्तेमाल किया? फिलहाल लग यही रहा है कि बैठे-बिठाए बुलाई गई यह आपदा भारत को और गरीब बना रही है, क्योंकि इसके निशाने पर गरीब हैं।

~ ओसामा मंजर
संस्थापक-निदेशक, डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन
साभार - हिन्दुस्तान | नजरिया | मुरादाबाद | शनिवार | 17 दिसंबर 2016

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